WHATSAPP Welcome to Edugrown – Your Learning Partner
← Back to Study Content
Quick revision notes

पाठ 5: कबीर के दोहे (Kabir Ke Dohe) Quick revision notes Class 8th Hindi (मल्हार) — कबीर

Class 8 · Hindi (Malhar) · Chapter 5 : कबीर के दोहे (Kabir Das ke dohe) · All Board · All Medium · 2 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD All Medium ENGLISH HINDI
📚 पाठ 5 • दोहे • Class 8 Hindi
कबीर के दोहे
✍️ कबीर | संदर्भ: कबीर वचनावली (संपा. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध')
📖 विस्तृत सारांश — कबीर के दोहे

🖊️ कवि-परिचय संक्षेप

कबीर (14वीं शताब्दी, काशी) — जुलाहा थे, करघे पर कपड़ा बुनते और मन में कविता रचते। निरक्षर थे पर ज्ञान का अगाध भंडार था। उनके शिष्यों ने उनकी वाणी संग्रहीत की — कबीर ग्रंथावली। आज भी उनके दोहे जीवन की सच्चाई सिखाते हैं।

📜 दोहा 1 — साँच बराबर तप नहीं

"साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।"

  • अर्थ: सत्य से बड़ी कोई तपस्या नहीं है, और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं।
  • जिसके हृदय में सत्य है — उसके हृदय में स्वयं गुरु (ईश्वर) विराजते हैं।
  • सीख: सत्य बोलना सबसे बड़ी साधना है; झूठ बोलना सबसे बड़ा पाप।

📜 दोहा 2 — बड़ा हुआ तो क्या हुआ

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।"

  • अर्थ: खजूर का पेड़ बड़ा तो होता है, पर न राहगीर को छाया देता है, न फल आसानी से मिलते हैं।
  • भाव: बड़प्पन या ऊँचाई तभी सार्थक है जब दूसरों के काम आए। जो बड़े होकर भी किसी के काम न आए, उसकी बड़ाई व्यर्थ है।
  • सीख: महानता दूसरों की सेवा में है, केवल ऊँचाई में नहीं।

📜 दोहा 3 — गुरु गोविंद दोऊ खड़े

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।"

  • अर्थ: यदि गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो पहले किसके पाँव छुएँ?
  • कबीर कहते हैं — पहले गुरु के, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर का मार्ग बताया।
  • सीख: गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है — गुरु ही ईश्वर तक पहुँचाता है।

📜 दोहा 4 — अति का भला न बोलना

"अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।"

  • अर्थ: न बहुत बोलना अच्छा है, न बहुत चुप रहना; न बहुत वर्षा अच्छी है, न बहुत धूप।
  • भाव: जीवन में हर चीज में संतुलन (Balance) जरूरी है। अति हमेशा हानिकारक होती है।
  • सीख: "अति सर्वत्र वर्जयेत्" — हर जगह अति से बचो।

📜 दोहा 5 — ऐसी बानी बोलिए

"ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपहुँ शीतल होय।।"

  • अर्थ: अहंकार (आपा) छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलो जो दूसरों को और स्वयं को शांत करे।
  • भाव: मधुर वाणी दूसरों को शांति देती है और बोलने वाले को भी।
  • सीख: अहंकार छोड़कर मीठा बोलो — यह सबसे बड़ा जीवन-कौशल है।

📜 दोहा 6 — निंदक नियरे राखिए

"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।"

  • अर्थ: जो आपकी निंदा (आलोचना) करे, उसे अपने पास रखो — आँगन में कुटी बनाकर भी।
  • वह बिना पानी-साबुन के स्वभाव को निर्मल (साफ) कर देता है।
  • सीख: आलोचक सबसे बड़ा सुधारक होता है। उससे भागो मत — उसे अपनाओ।

📜 दोहा 7 — साधू ऐसा चाहिए

"साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।"

  • अर्थ: सज्जन पुरुष सूप (अनाज साफ करने का बर्तन) जैसा होना चाहिए — जो सार (गुण) ग्रहण करे और थोथा (व्यर्थ) उड़ा दे।
  • सीख: जीवन में अच्छाई ग्रहण करो, बुराई को छोड़ दो।

📜 दोहा 8 — कबिरा मन पंछी भयो

"कबिरा मन पंछी भयो, भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।"

  • अर्थ: मन पंछी की तरह है — जहाँ चाहे जा सकता है।
  • जो जैसी संगति करेगा, वैसा ही फल पाएगा।
  • सीख: संगति का बहुत प्रभाव पड़ता है — अच्छी संगति अच्छा फल, बुरी संगति बुरा।
💡 समग्र संदेश
कबीर के दोहे जीवन के आठ मूल पाठ सिखाते हैं — सत्य, परोपकार, गुरु-महिमा, संतुलन, मधुर वाणी, आलोचना-स्वीकृति, विवेक और सत्संगति। ये दोहे 600 साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
🎯 पाठ का परिचय
  • यह पाठ संत कबीर के 8 दोहों का संकलन है।
  • दोहे — नीति, ज्ञान और जीवन-सत्य के छोटे-छोटे रत्न।
  • कबीर के दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
  • भाषा — ब्रजभाषा, खड़ी बोली और अवधी का मिश्रण (सधुक्कड़ी भाषा)
✍️ कवि परिचय — कबीर
विवरणजानकारी
जन्म-कालचौदहवीं शताब्दी (अनुमानत:)
जन्म स्थानकाशी (वाराणसी)
व्यवसायजुलाहा (करघे पर कपड़ा बुनते थे)
गुरुरामानंद
रचनाएँकबीर ग्रंथावली में संगृहीत
भाषासधुक्कड़ी / पंचमेल खिचड़ी — ब्रज, अवधी, खड़ी बोली
विशेषतानिर्गुण भक्ति, समाज-सुधार, पाखंड का विरोध
🪔 दोहे और उनका अर्थ
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
📖 अर्थ:
सत्य के बराबर कोई तप नहीं और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य है, उसके हृदय में ईश्वर/गुरु स्वयं निवास करते हैं।
सत्य का पालन ही सबसे बड़ी भक्ति और तपस्या है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
📖 अर्थ:
खजूर जैसे बड़े होने का क्या लाभ, जो न यात्री को छाया देता है न फल आसानी से मिलता है। बड़ाई वही जो दूसरों के काम आए।
बड़ा व्यक्ति वही जो दूसरों के काम आए — केवल ऊँचाई से महानता नहीं।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
📖 अर्थ:
गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ खड़े हों तो किसके पाँव पहले छूएँ? — पहले गुरु के, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर का परिचय कराया।
गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है — गुरु ही ईश्वर का मार्ग दिखाता है।
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
📖 अर्थ:
न अत्यधिक बोलना अच्छा है, न अत्यधिक चुप रहना। न अत्यधिक वर्षा अच्छी है, न अत्यधिक धूप।
हर चीज में संतुलन जरूरी है — अति सर्वत्र वर्जयेत्।
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
📖 अर्थ:
ऐसी वाणी बोलो जिसमें अहंकार न हो, जो दूसरों को शांति दे और स्वयं को भी शांति मिले।
मधुर और विनम्र वाणी से सबका मन शांत होता है।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।
📖 अर्थ:
आलोचना करने वाले को पास रखो — वह पानी-साबुन के बिना ही हमारे स्वभाव को शुद्ध कर देता है।
आलोचक हमारे सुधार में मदद करते हैं — उनसे दूर मत भागो।
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
📖 अर्थ:
सज्जन व्यक्ति सूप (अनाज साफ करने का उपकरण) जैसा होना चाहिए — जो सार को रखे और व्यर्थ को उड़ा दे।
अच्छे लोग केवल सार वस्तु ग्रहण करते हैं और व्यर्थ को त्याग देते हैं।
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।
📖 अर्थ:
मन पक्षी की तरह है — जहाँ चाहे उड़ जाए। जो जैसी संगति करता है, वैसा ही फल पाता है।
संगति का व्यक्ति के चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है — सत्संगति करो।
📌 कठिन शब्द और शब्दार्थ
शब्दअर्थ
साँचसत्य (सच)
हिरदेहृदय
पंथीयात्री, राहगीर
गोविंदईश्वर, भगवान
बलिहारीन्यौछावर, कुर्बान
अतिअत्यधिक, बहुत
बानीवाणी, बोली
आपाअहंकार, घमंड
सीतलशीतल, ठंडा, शांत
निंदकनिंदा/आलोचना करने वाला
नियरेनजदीक, पास
सुभायस्वभाव, प्रकृति
सूपअनाज साफ करने का छाजन
थोथाखोखला, व्यर्थ
तहवाँवहाँ
🎨 दोहे की विशेषताएँ
  • दोहा — 24 मात्राओं का मात्रिक छंद (13+11)।
  • भाषा — सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) — ब्रज + अवधी + खड़ी बोली।
  • उपमा — "जैसे पेड़ खजूर", "जैसा सूप सुभाय"।
  • व्यावहारिक जीवन से उदाहरण — खजूर, सूप, निंदक।
  • सरल भाषा में गहरे जीवन-सत्य।
🌟 मुख्य शिक्षाएँ (एक नज़र में)
💡 याद करने योग्य संदेश
दोहे की विशेषतामुख्य शिक्षा
साँच बराबर तप नहींसत्य सबसे बड़ा तप है
बड़ा हुआ तो क्या हुआदूसरों के काम आना जरूरी
गुरु गोविंद दोऊगुरु का स्थान सर्वोपरि
अति का भला नहर चीज में संतुलन रखो
ऐसी बानी बोलिएमधुर वाणी सबको शांत करे
निंदक नियरे राखिएआलोचक से सुधार होता है
साधू ऐसा चाहिएसार ग्रहण करो, व्यर्थ छोड़ो
मन पंछी भयाअच्छी संगति करो
🔁 Quick Revision
✍️कवि:
कबीर (14वीं शताब्दी)
📖विधा:
दोहा (नीति काव्य)
🔢दोहे:
8 दोहे
🏙️जन्म स्थान:
काशी
🧵व्यवसाय:
जुलाहा
📚रचना:
कबीर ग्रंथावली

🌸 @edugrown — Premium Class 8 Hindi Notes

ये नोट्स केवल रिवीजन के लिए हैं। परीक्षा से पहले पाठ अवश्य पढ़ें।

💬 Comments & Doubts

💭

Abhi tak koi comment nahi

Sabse pehle comment karne wale bano!

Apna comment likhein

Doubt ho ya suggestion — kuch bhi poochh sakte hain. Login zaroori nahi hai.

15 − 2 =

Ye sirf ye confirm karne ke liye hai ki aap robot nahi hain.

Comment publish hone se pehle admin check karta hai.

🔔 Email Updates Lein

Naya content aate hi email par pata chal jayega. Sirf wahi sections chunein jo chahiye.

🔒 Content copy nahi kar sakte