📚 पाठ 7 • कविता • Class 8 Hindi
मत बाँधो
✍️ महादेवी वर्मा | पुस्तक: मल्हार
📖 विस्तृत सारांश — मत बाँधो
🖊️ रचना-परिचय
महादेवी वर्मा (1907–1987) — हिंदी साहित्य की महान कवयित्री, चित्रकार और गद्य लेखिका। उनका जन्म फर्रुखाबाद (उ.प्र.) में हुआ। उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। कविता संग्रह — नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा। गद्य — मेरा परिवार, अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी।
📜 भाग 1 — सपनों को मत रोको (पंक्ति-भावार्थ)
टेक (Refrain): "इन सपनों के पंख न काटो / इन सपनों की गति मत बाँधो!" — यह पंक्ति बार-बार आती है।
- "सौरभ उड़ जाता है नभ में, फिर वह लौट कहाँ आता है?" — सुगंध एक बार उड़ी तो स्वतंत्र रूप से फैलती है; उसे रोका नहीं जा सकता। उसी तरह सपने भी स्वतंत्र हैं।
- "बीज धूलि में गिर जाता जो, वह नभ में कब उड़ पाता है?" — जो बीज मिट्टी में ही पड़ा रहे, वह कभी उड़ नहीं सकता। जो सपना ही नहीं देखता — वह भी उड़ नहीं सकता।
- "अग्नि सदा धरती पर जलती, धूम गगन में मँडराता है" — आग (वास्तविकता) नीचे जलती है, पर धुआँ (सपना) ऊपर जाता है। सपनों में दोनों गतियाँ हैं — जड़ें भी, उड़ान भी।
- "सपनों में दोनों ही गति हैं, उड़ कर आँखों में आता है!" — सपना ऊपर जाता है और आँखों में लौटकर आता है — अर्थात पृथ्वी को प्रकाशित करता है।
📜 भाग 2 — सपनों का आरोहण-अवरोहण
- "इसका आरोहण मत रोको, इसका अवरोहण मत बाँधो!" — न उड़ान रोको, न वापसी बाँधो।
- "मुक्त गगन में विचरण कर यह, तारों में फिर मिल जायेगा" — सपने खुले आकाश में उड़कर तारों से मिलेंगे — यानी ऊँचे लक्ष्य पाएंगे।
- "मेघों से रंग औ' किरणों से, दीप्ति लिए भू पर आयेगा" — बादलों से रंग (विविधता) और सूर्य-किरणों से चमक लेकर पृथ्वी पर वापस आएगा।
- "स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प, भूमि को सिखलायेगा!" — लौटकर पृथ्वी को सुंदर बनाने की कला सिखाएगा — यानी आदर्श समाज बनाने की प्रेरणा देगा।
📜 भाग 3 — मत बाँधो (निष्कर्ष)
- "नभ तक जाने से मत रोको, धरती से इसको मत बाँधो!" — आकाश तक पहुँचने से रोको मत; पृथ्वी की सीमाओं में बाँधो मत।
- कविता फिर टेक पर लौटती है — "इन सपनों के पंख न काटो / इन सपनों की गति मत बाँधो!"
💡 केंद्रीय संदेश
सपने उड़ते हैं — आकाश छूते हैं — और लौटकर पृथ्वी को स्वर्ग बनाते हैं। इसलिए सपनों के पंख मत काटो, उनकी गति मत बाँधो। जो सपना नहीं देखता, वह बीज की तरह मिट्टी में ही पड़ा रहता है — उड़ नहीं सकता।
🎯 कविता का परिचय
- यह एक स्वतंत्रता और उन्मुक्तता की कविता है।
- कविता सपनों की स्वतंत्रता की बात करती है — उन्हें न काटो, न बाँधो।
- मुख्य विषय — स्वप्नों को खुला छोड़ो, वे उड़कर आकाश छुएंगे और लौटकर पृथ्वी को सुंदर बनाएंगे।
- सुंदर प्रकृति के बिंबों का प्रयोग — सौरभ, बीज, अग्नि, धुआँ, मेघ, किरण।
✍️ कवयित्री परिचय — महादेवी वर्मा
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| जन्म-मृत्यु | 1907–1987 |
| जन्म स्थान | फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश |
| विशेषता | छोटी उम्र से कविता लेखन |
| प्रसिद्ध गद्य | मेरा परिवार, अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी |
| कविता संग्रह | नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्य गीत, दीपशिखा |
| पुरस्कार | भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार |
| अन्य | चित्रकार भी थीं; बच्चों के लिए कविताएँ लिखी |
📝 संपूर्ण कविता
इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो!
सौरभ उड़ जाता है नभ में
फिर वह लौट कहाँ आता है?
बीज धूलि में गिर जाता जो
वह नभ में कब उड़ पाता है?
अग्नि सदा धरती पर जलती
धूम गगन में मँडराता है!
सपनों में दोनों ही गति हैं
उड़ कर आँखों में आता है!
इसका आरोहण मत रोको
इसका अवरोहण मत बाँधो!
मुक्त गगन में विचरण कर यह
तारों में फिर मिल जायेगा,
मेघों से रंग औ' किरणों से
दीप्ति लिए भू पर आयेगा।
स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प
भूमि को सिखलायेगा!
नभ तक जाने से मत रोको
धरती से इसको मत बाँधो!
इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो!
इन सपनों की गति मत बाँधो!
सौरभ उड़ जाता है नभ में
फिर वह लौट कहाँ आता है?
बीज धूलि में गिर जाता जो
वह नभ में कब उड़ पाता है?
अग्नि सदा धरती पर जलती
धूम गगन में मँडराता है!
सपनों में दोनों ही गति हैं
उड़ कर आँखों में आता है!
इसका आरोहण मत रोको
इसका अवरोहण मत बाँधो!
मुक्त गगन में विचरण कर यह
तारों में फिर मिल जायेगा,
मेघों से रंग औ' किरणों से
दीप्ति लिए भू पर आयेगा।
स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प
भूमि को सिखलायेगा!
नभ तक जाने से मत रोको
धरती से इसको मत बाँधो!
इन सपनों के पंख न काटो
इन सपनों की गति मत बाँधो!
— महादेवी वर्मा
🔍 भावार्थ (भाग-वार)
🌸 पहला भाग — सपनों की स्वतंत्रता का आह्वान
- "सौरभ उड़ जाता है" — सुगंध स्वतंत्र रूप से उड़ती है, लौटती नहीं — सपनों को रोका नहीं जा सकता।
- "बीज धूलि में गिर जाता" — बीज धरती पर गिरता है, उड़ नहीं सकता — जो सपना ही न देखे, वह कभी उड़ न पाए।
- "अग्नि धरती पर जलती, धूम गगन में" — सपनों में दोनों दिशाएँ हैं — नीचे जड़ें, ऊपर उड़ान।
✨ दूसरा भाग — सपनों का लक्ष्य और वापसी
- सपने मुक्त आकाश में विचरण करेंगे, तारों से मिलेंगे।
- मेघों से रंग, किरणों से दीप्ति लेकर पृथ्वी पर लौटेंगे।
- लौटकर स्वर्ग बनाने का शिल्प पृथ्वी को सिखाएंगे।
महत्वपूर्ण भाव: सपने उड़ान लेते हैं — आकाश को छूते हैं — और लौटकर पृथ्वी को सुंदर बनाते हैं। इसीलिए सपनों की गति को मत बाँधो।
🎨 काव्य में प्रतीक (Symbols)
🌸
सौरभ (सुगंध)
स्वतंत्र स्वप्न जो रोका न जाए
🌱
बीज
स्वप्नहीन व्यक्ति — उड़ नहीं सकता
🔥
अग्नि
धरती पर जड़ें (वास्तविकता)
💨
धुआँ/धूम
सपने — ऊपर की ओर उठते हैं
⭐
तारे
ऊँचे लक्ष्य
☀️
किरण / दीप्ति
ज्ञान और प्रकाश
🎭 काव्य विशेषताएँ
- पुनरुक्ति (Refrain) — "इन सपनों के पंख न काटो / इन सपनों की गति मत बाँधो!" — बार-बार आता है।
- प्रकृति के बिंब — सौरभ, बीज, अग्नि, धुआँ, मेघ, किरण, तारे।
- मानवीकरण — सपने उड़ते, आँखों में आते हैं।
- आरोहण/अवरोहण — स्वर-विज्ञान शब्दावली का प्रयोग।
📌 कठिन शब्द और शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सपनों की गति | सपनों की दिशा/प्रवाह |
| सौरभ | सुगंध, खुशबू |
| नभ | आकाश |
| धूलि | धूल, मिट्टी |
| अग्नि | आग |
| धूम | धुआँ |
| गगन | आकाश |
| मँडराना | चक्कर लगाना, मंडलाना |
| आरोहण | ऊपर चढ़ना |
| अवरोहण | नीचे उतरना |
| मुक्त गगन | खुला आकाश |
| विचरण | घूमना, भ्रमण करना |
| मेघ | बादल |
| दीप्ति | चमक, प्रकाश |
| शिल्प | कला, कौशल |
| भू / भूमि | पृथ्वी |
🌟 काव्य-संदेश
💡 मुख्य संदेश
- सपनों को स्वतंत्र रहने दो — उन्हें काटो मत, बाँधो मत।
- बड़े सपने आकाश की ऊँचाई छूते हैं और लौटकर पृथ्वी को समृद्ध करते हैं।
- सपनों में उड़ान भी है और जमीन से जुड़ाव भी — दोनों गतियाँ हैं।
- जो सपना ही नहीं देखता वह उड़ नहीं सकता (बीज की तरह)।
🔁 Quick Revision
✍️कवयित्री:
महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा
📖विधा:
प्रेरक कविता
प्रेरक कविता
🎯विषय:
सपनों की स्वतंत्रता
सपनों की स्वतंत्रता
🏆पुरस्कार:
ज्ञानपीठ
ज्ञानपीठ
📚संग्रह:
दीपशिखा (प्रसिद्ध)
दीपशिखा (प्रसिद्ध)
🌟जन्म:
1907, फर्रुखाबाद
1907, फर्रुखाबाद