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Quick revision notes

पाठ 9: आदमी का अनुपात (Aadmi Ka Anupaat) Quick revision notes Class 8th Hindi (मल्हार) — गिरिजा कुमार माथुर

Class 8 · Hindi (Malhar) · Chapter 9 : आदमी का अनुपात (Aadmi ka anupaa) · All Board · All Medium · 2 views

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📖 विस्तृत सारांश — आदमी का अनुपात

🖊️ रचना-परिचय

गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994) का जन्म अशोकनगर जनपद (म.प्र.) में हुआ। पिता देवीचरण माथुर भी कवि थे। आकाशवाणी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। कृतियाँ — मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले। प्रसिद्ध भावांतर गीत 'हम होंगे कामयाब' के रचयिता।

📜 भाग 1 — क्रमिक विस्तार (आदमी से ब्रह्मांड तक)

कविता एक अनूठी संरचना में है — सबसे छोटे से सबसे बड़े की ओर:

  • "दो व्यक्ति कमरे में, कमरे से छोटे" — दो इंसान एक कमरे में हैं; वे कमरे से भी छोटे हैं।
  • कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी — क्रमशः विस्तार।
  • "अनगिन नक्षत्रों में, पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक ही" — करोड़ों तारों में पृथ्वी बस एक छोटी-सी है।
  • "सबको समेटे है, परिधि नभ गंगा की" — आकाशगंगा (Milky Way) इन सबको समेटती है।
  • "लाखों ब्रह्मांडों में, अपना एक ब्रह्मांड" — हमारा ब्रह्मांड लाखों में से एक है।
  • "हर ब्रह्मांड में, कितनी ही पृथ्वियाँ, कितनी ही भूमियाँ, कितनी ही सृष्टियाँ" — असंख्य सृष्टियाँ।
  • "यह है अनुपात, आदमी का विराट से" — यही है मनुष्य का ब्रह्मांड के सामने अनुपात — लगभग शून्य।

📜 भाग 2 — मानव का अहंकार (विडंबना)

यहाँ कविता का मुख्य विरोधाभास (Paradox) सामने आता है:

  • "इस पर भी आदमी, ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन" — इतने विशाल ब्रह्मांड में इतने क्षुद्र होने के बावजूद मानव इन नकारात्मक भावों से भरा है।
  • "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है" — असंख्य दीवारें खड़ी करता है — जाति, धर्म, देश, भाषा के विभाजन।
  • "अपने को दूजे का स्वामी बताता है" — दूसरों पर अधिकार जताता है, उन्हें अपना दास मानता है।
  • "देशों की कौन कहे, एक कमरे में, दो दुनिया रचाता है" — यह सबसे तीखी पंक्ति है। देशों में तो झगड़े होते ही हैं — पर एक ही कमरे में रहने वाले दो लोग भी अपनी-अपनी अलग दुनिया बना लेते हैं।

🔮 काव्य-संरचना की विशेषता

  • Zoom-out technique: micro (दो व्यक्ति) से macro (ब्रह्मांड) तक — अत्यंत प्रभावशाली।
  • Irony (विडंबना): जो इतना छोटा है, वह इतना बड़ा अहंकार रखता है।
  • कविता शुरू और अंत दोनों में "कमरे" का प्रयोग — Circular structure।
  • सरल भाषा में गहरा दार्शनिक संदेश।
💡 केंद्रीय संदेश
ब्रह्मांड के सामने मानव का अस्तित्व लगभग नगण्य है — फिर भी वह अहंकार, ईर्ष्या और विभाजन में जीता है। यदि यह अनुपात समझ जाए, तो शायद अहंकार खुद-ब-खुद टूट जाए और मानवता पनपे। विनम्रता और विश्व-बंधुत्व ही वास्तविक मानवता है।
🎯 कविता का परिचय
  • यह एक दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कविता है।
  • कविता में दिखाया गया है — ब्रह्मांड में मानव कितना छोटा है।
  • लेकिन इतना छोटा होने पर भी मानव अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ से भरा है।
  • मुख्य विषय — मानव लघुता और उसका अहंकार का विरोधाभास।
✍️ कवि परिचय — गिरिजा कुमार माथुर
विवरणजानकारी
जन्म-मृत्यु1919–1994
जन्म स्थानअशोकनगर जनपद, मध्य प्रदेश
पितादेवीचरण माथुर — वे भी कवि थे
सेवाआकाशवाणी में महत्वपूर्ण पदों पर
प्रमुख कृतियाँमंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले
प्रसिद्ध रचना"हम होंगे कामयाब" — भावांतर गीत
विधाएँकविता, नाटक, गीत, कहानी, निबंध
📝 संपूर्ण कविता
दो व्यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे —
कमरा है घर में
घर है मुहल्ले में
मुहल्ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्वी पर
अनगिन नक्षत्रों में
पृथ्वी एक छोटी
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे है
परिधि नभ गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
अपना एक ब्रह्मांड
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात
आदमी का विराट से
इस पर भी आदमी
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन
संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है
अपने को दूजे का स्वामी बताता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
दो दुनिया रचाता है
— गिरिजा कुमार माथुर
🔍 भावार्थ

📐 पहला भाग — मानव का अनुपात (Proportion)

दो व्यक्ति (कमरे से भी छोटे)
कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी
पृथ्वी = करोड़ों नक्षत्रों में से एक
नभगंगा → लाखों ब्रह्मांड → असंख्य पृथ्वियाँ-सृष्टियाँ
= आदमी अत्यंत सूक्ष्म है विराट ब्रह्मांड के सामने!

⚠️ दूसरा भाग — मानव का अहंकार

  • इतना छोटा होने पर भी — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास से भरा।
  • "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है" — विभाजन करता है।
  • "अपने को दूजे का स्वामी बताता है" — दूसरों पर अधिकार जताता है।
  • देशों की क्या बात — एक कमरे में भी दो दुनिया रचा लेता है।
विरोधाभास (Paradox): मानव ब्रह्मांड में सबसे छोटा है — फिर भी सबसे बड़ा अहंकार रखता है। यही कविता का केंद्रीय विरोधाभास है।
💎 मुख्य भाव
  • ब्रह्मांड के सामने मानव का अस्तित्व अत्यंत नगण्य है।
  • मानव अपनी लघुता को भूलकर अहंकार में जीता है।
  • विभाजन, शत्रुता, स्वार्थ — ये मानव की सबसे बड़ी कमजोरियाँ हैं।
  • संदेश — विनम्र बनो, विश्व-बंधुत्व की भावना रखो।
📌 कठिन शब्द और शब्दार्थ
शब्दअर्थ
अनुपातअनुपात, ratio
विराटबहुत बड़ा, विशाल
अनगिनअनगिनत, असंख्य
नक्षत्रतारे, ग्रह-नक्षत्र
परिधिसीमा, घेरा
नभ गंगाआकाश गंगा (Milky Way)
ब्रह्मांडविश्व, Universe
सृष्टिसम्पूर्ण जगत/Creation
ईर्ष्याजलन, द्वेष
अहंअहंकार, घमंड
स्वार्थअपना हित सोचना
घृणानफरत
संख्यातीतजिनकी गिनती न हो, असंख्य
दूजेदूसरे व्यक्ति
स्वामीमालिक
🌟 काव्य-संदेश
💡 मुख्य संदेश
  1. मानव ब्रह्मांड में अत्यंत सूक्ष्म है — अहंकार व्यर्थ है।
  2. ईर्ष्या, स्वार्थ, घृणा — ये मानव को और छोटा बनाती हैं।
  3. विभाजन मत करो — एकता और सद्भाव अपनाओ।
  4. विश्व-बंधुत्व की भावना ही मानव की सही पहचान है।
🔁 Quick Revision
✍️कवि:
गिरिजा कुमार माथुर
📖विधा:
दार्शनिक कविता
🌌विषय:
मानव-ब्रह्मांड अनुपात
🎵प्रसिद्ध:
हम होंगे कामयाब
🏢सेवा:
आकाशवाणी
💡संदेश:
अहंकार व्यर्थ है
💡 याद रखें
  • दो व्यक्ति → कमरा → घर → ... → ब्रह्मांड — क्रमिक विस्तार
  • मानव = ब्रह्मांड में अत्यंत सूक्ष्म, फिर भी अहंकारी।
  • "एक कमरे में दो दुनिया" — विभाजन की प्रवृत्ति।
  • नभ गंगा = Milky Way आकाशगंगा।

🌸 @edugrown — Premium Class 8 Hindi Notes

ये नोट्स केवल रिवीजन के लिए हैं। परीक्षा से पहले पाठ अवश्य पढ़ें।

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