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Quick revision notes

पञ्चमः पाठः: सेवा हि परमो धर्मः (Sevā Hi Paramo Dharmaḥ) Quick Revision Notes Class 8th Sanskrit (दीपकम्)

Class 7 · Sanskrit (दीपकम्) · Chapter 5 : सेवा हि परमो धर्मः (Sevā Hi Paramo Dharmaḥ) · All Board · All Medium · 0 views

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🤝 पाठ का परिचय
Nagarjuna chemistry lab with two candidates
✏️ नागार्जुन प्रयोगशाला में सहायक की परीक्षा ले रहे हैं
प्रियच्छात्राः ! जीवने सफलतायै मानवः किं किम् अर्जयेत् ? … मानवीयाः गुणाः अपि आवश्यकाः भोः ! यथा सिद्धार्थस्य जीवने विद्या, धनं, पदं च सर्वमपि आसीत् । किन्तु मानवीयगुणैः एव सः महात्मा बुद्धः जातः ।
🔵 हिन्दी: प्रिय छात्रों! जीवन में सफलता के लिए मनुष्य को क्या-क्या कमाना चाहिए? ... (छात्र बोले: विद्या! धन! पद!) ... मानवीय गुण भी आवश्यक हैं। जैसे सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन, पद — सब था। लेकिन मानवीय गुणों से ही वे महात्मा बुद्ध बने।
💡 विद्या + धन + पद = काफी नहीं। मानवीय गुण = सच्ची महानता।
सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः इत्यादयः मानवीयाः गुणाः सन्ति ।
🔵 हिन्दी: सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार और अक्रोध — ये मानवीय गुण हैं।
💡 इन गुणों से मनुष्य महान् बनता है।
📖 नागार्जुन की कहानी — पद-दर-पद
नागार्जुनः प्रसिद्धः रसायनशास्त्रज्ञः चिकित्सकः च आसीत् । सः अहोरात्रं प्रयोगशालायां कार्यं करोति स्म ।
🔵 हिन्दी: नागार्जुन एक प्रसिद्ध रसायनशास्त्री (केमिस्ट) और वैद्य (चिकित्सक) थे। वे रात-दिन प्रयोगशाला में काम करते थे।
💡 नागार्जुन = प्राचीन भारत के महान् वैज्ञानिक और चिकित्सक।
एकदा सः महाराजं निवेदितवान् — 'महाराज! मम चिकित्साकार्याय एकः सहायकः आवश्यकः' इति । राजा एतद् अङ्गीकृतवान् उक्तवान् च — 'अस्तु, श्वः केचन योग्याः युवकाः आगमिष्यन्ति । भवान् परीक्षां कृत्वा तेषु कमपि योग्यं स्वीकरोतु' इति ।
🔵 हिन्दी: एक बार उन्होंने महाराजा से निवेदन किया — 'महाराज! मुझे अपने चिकित्सा-कार्य के लिए एक सहायक की आवश्यकता है।' राजा ने यह स्वीकार कर कहा — 'ठीक है, कल कुछ योग्य युवक आएंगे। आप परीक्षा करके किसी एक को चुन लें।'
💡 नागार्जुन को सहायक की जरूरत थी। राजा ने मदद का वादा किया।
अन्यस्मिन् दिने द्वौ युवकौ आगतवन्तौ । नागार्जुनः द्वयोः विद्याभ्यासविषये पृष्टवान् । द्वयोः अपि विद्याभ्यासविषयः समानः एव आसीत् । तदा नागार्जुनः तौ एकं विशिष्टं रसायनं निर्माय आगच्छताम् इति सूचितवान् । तदर्थं दिनद्वयस्य अवसरं दत्तवान् । 'गमनसमये राजमार्गेण गच्छताम्' इत्यपि सूचितवान् ।
🔵 हिन्दी: दूसरे दिन दो युवक आए। नागार्जुन ने दोनों से पढ़ाई के बारे में पूछा। दोनों की पढ़ाई समान थी। तब नागार्जुन ने दोनों को एक विशेष रसायन बनाकर लाने को कहा। इसके लिए दो दिन का समय दिया। 'जाते समय राजमार्ग (मुख्य सड़क) से जाना' — यह भी निर्देश दिया।
💡 दोनों की योग्यता समान थी। अब असली परीक्षा — एक विशेष रसायन बनाओ।
Second youth helping sick man on road showing service
✏️ दूसरा युवक रास्ते में बीमार व्यक्ति की सेवा कर रहा है
दिनद्वयानन्तरं नागार्जुनस्य समीपे प्रथमः युवकः आगतवान् । युवकः स्वनिष्ठां दर्शयितुं स्वगृहस्य समस्याः वर्णितवान् — 'पितुः उदरवेदना, मातुः ज्वरः च आसीत् । तथापि अहं तत्सर्वं परित्यज्य औषधं निर्मितवान्' इति उक्त्वा नागार्जुनाय रसायनं दत्तवान् ।
🔵 हिन्दी: दो दिन बाद पहला युवक नागार्जुन के पास आया। उसने अपनी निष्ठा दिखाने के लिए घर की मुश्किलें बताईं — 'पिताजी को पेट-दर्द था, माँ को बुखार था। फिर भी मैंने यह सब छोड़कर औषध बनाया।' यह कहकर उसने रसायन दे दिया।
💡 पहला युवक: काम पूरा किया पर घर की समस्याओं को अनदेखा किया।
तदभ्यन्तरे द्वितीयः युवकः अपि आगतवान् । सः खिन्नः आसीत् । 'राजमार्गे अहं कञ्चित् रोगिणं दृष्टवान् । तस्य परिस्थितिः शोचनीया आसीत् । अहं तं स्वगृहं नीतवान् । दिनद्वयं तस्य एव सेवायां निरतः आसम् । अद्य प्रातः सः स्वस्थः अभवत् । अहं ततः साक्षात् अत्र आगतवान् । रसायननिर्माणार्थं समयं न प्राप्तवान्' इति ।
🔵 हिन्दी: उसी बीच दूसरा युवक भी आया। वह दुखी था। (उसने कहा —) 'राजमार्ग पर मैंने एक बीमार व्यक्ति को देखा। उसकी दशा दयनीय थी। मैं उसे अपने घर ले गया। दो दिन उसकी ही सेवा में लगा रहा। आज सुबह वह स्वस्थ हो गया। मैं तुरंत यहाँ आया हूँ। रसायन बनाने का समय नहीं मिला।'
💡 दूसरा युवक: काम नहीं कर पाया पर एक बीमार की निस्वार्थ सेवा की।
तदनन्तरं नागार्जुनः द्वितीयं युवकं सहायकत्वेन स्वीकृतवान् । नागार्जुनः अवदत् — 'द्वितीयः अपि औषधनिर्माणे कुशलः अस्ति । किन्तु तेन समयः न प्राप्तः यतः सः सेवायां निरतः आसीत् ।... सेवाभावना विना चिकित्सकः कथं भवेत् ?'
🔵 हिन्दी: इसके बाद नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक के रूप में चुना। नागार्जुन ने कहा — 'दूसरा भी औषध बनाने में कुशल है। लेकिन उसे समय नहीं मिला क्योंकि वह सेवा में लगा था... सेवाभाव के बिना चिकित्सक कैसे बन सकता है?'
💡 नागार्जुन ने सेवाभाव वाले को चुना। सेवा ही सबसे बड़ा गुण है।
सेवा हि परमो धर्मः
सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।
इस पाठ का मुख्य सन्देश: दूसरों की सेवा ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
📚 @edugrown | दीपकम् | कक्षा ७

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