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Quick revision notes

Chapter-2 क्या लिखूँ? (Kya Likhoon?) Quick Revision notes | Class 9th Hindi (Ganga) Summary

Class 9 · Hindi (Ganga) · All Board · ENGLISH · 8 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD
Chapter 2 | अध्याय २
✍️ क्या लिखूँ?
— पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (निबंध)

यह एक हास्य-व्यंग्यात्मक निबंध है जिसमें लेखक बताते हैं कि उन्हें दो विद्यार्थियों — नमिता और अमिता — के लिए दो "आदर्श निबंध" लिखने हैं। नमिता चाहती है "दूर के ढोल सुहावने होते हैं" पर निबंध, और अमिता चाहती है "समाज-सुधार" पर निबंध। लेखक इसी उलझन के सहारे पूरे निबंध में यह समझाते हैं कि अच्छा निबंध आखिर लिखा कैसे जाता है।

🔸 गार्डिनर का विचार — भाव ही असली चीज़ है

निबंध की शुरुआत अंग्रेज़ी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर के विचार से होती है — उनका मानना था कि लिखने के लिए मन में स्वतः एक विशेष उमंग, स्फूर्ति और आवेग पैदा होता है, तब लेखक कोई भी विषय लेकर अपने मन के भाव उसमें भर देता है। जैसे "हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम आ सकती है" — असली चीज़ हैट (भाव) है, खूँटी (विषय) नहीं। लेकिन लेखक कहते हैं कि उन्हें ऐसी सहज मानसिक स्थिति का अनुभव नहीं होता — उन्हें सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है।

🔸 निबंधशास्त्र के आचार्यों की सलाह

लेखक व्यंग्यात्मक ढंग से बताते हैं कि उन्होंने निबंध लिखने के "नियम" जानने के लिए कई विद्वानों की राय देखी:

  • एक विद्वान कहते हैं — निबंध छोटा होना चाहिए, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बचती।
  • निबंध के दो प्रधान अंग बताए गए — सामग्री और शैली। पहले विचार-सामग्री इकट्ठा करनी चाहिए, फिर उसकी रूपरेखा बनानी चाहिए — पर लेखक कहते हैं कि उनके पास न समय है, न पुस्तकालय जाने का मौका, इसलिए वे सीधे अपने ज्ञान के भरोसे लिखना शुरू करते हैं।
  • शैली को लेकर कहा गया कि वाक्य छोटे-छोटे और स्पष्ट होने चाहिए — पर लेखक मज़ाक में कहते हैं कि वे "मास्टर" हैं, इसलिए अपनी विद्वता दिखाने के लिए वाक्य कम-से-कम आधा पन्ना लंबा और अस्पष्ट होना चाहिए (यह पूरी तरह व्यंग्य है, जो दिखावटी और क्लिष्ट लेखन पर चोट करता है)।

😄 मज़ेदार बात: लेखक ए.जी. गार्डिनर और शेक्सपियर का उदाहरण देते हैं कि उन्हें भी अपने लेखों/नाटकों का शीर्षक रखने में सबसे ज़्यादा दिक्कत होती थी — यहाँ तक कि शेक्सपियर ने घबराकर एक नाटक का नाम ही रख दिया "जैसा तुम चाहो"!

🔸 दो अलग-अलग परंपराएँ — शास्त्रीय बनाम मॉन्टेन शैली

लेखक बताते हैं कि भारतीय परंपरा में (जैसे बाणभट्ट, श्रीहर्ष) निबंध में जानबूझकर अलंकार, कठिन भाषा और गंभीरता लाई जाती थी। इसके विपरीत अंग्रेज़ी निबंधकार मॉन्टेन की शैली अलग थी — वे जो खुद देखते, सुनते, अनुभव करते, उसे सीधी-सादी भाषा में लिख देते थे। ऐसे निबंधों में लेखक की सच्ची अनुभूति और सहजता झलकती है, न कि दिखावटी ज्ञान।

🔸 अमीर खुसरो की कहानी — एक चतुराई भरा हल

लेखक को अमीर खुसरो की एक कहानी याद आती है — एक बार चार औरतों ने उनसे अलग-अलग विषयों (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) पर कविता माँगी, तो उन्होंने एक ही दोहे में चारों की इच्छा पूरी कर दी:
"खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।"
इसी तरह लेखक भी चतुराई से "दूर के ढोल सुहावने" और "समाज-सुधार" — दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ने का फैसला करते हैं।

🔸 अंतिम भाग — असली निबंध की शुरुआत

निबंध के आख़िरी हिस्से में लेखक असल में विषय पर लिखना शुरू करते हैं:

  • दूर के ढोल सुहावने: पास बैठे लोगों के लिए ढोल की आवाज़ कर्कश (कठोर) होती है, पर दूर बैठे व्यक्ति के लिए वही आवाज़ मधुर लगती है क्योंकि दूरी उसकी कठोरता को नरम कर देती है। इसी तरह जो तरुण (युवा) संसार के संघर्ष से दूर हैं, उन्हें जीवन बहुत सुंदर लगता है; और जो वृद्ध हो चुके हैं, उन्हें अपना बीता हुआ अतीत सुखद लगता है — दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
  • समाज-सुधार: लेखक कहते हैं कि मनुष्य जाति के इतिहास में कभी ऐसा दौर नहीं आया जब सुधार की ज़रूरत न रही हो — बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, गांधी जी — सब सुधारक रहे। जो चीज़ें कभी सुधार मानी गई थीं, वे आज दोष बन गई हैं और उनका फिर नया सुधार होता है — इसी वजह से जीवन को "प्रगतिशील" कहा जाता है।

🌿 निबंध का सार: यह निबंध हास्य-व्यंग्य के ज़रिए बताता है कि निबंध लिखने का कोई एक "सही तरीका" नहीं होता — असली निबंध वही है जिसमें लेखक का सच्चा अनुभव और सहज भाव झलके, न कि दिखावटी नियमों का बोझ। साथ ही यह आत्मपरक (लेखक खुद पाठकों से बात करता हुआ) शैली इस निबंध को बहुत जीवंत और रोचक बनाती है।

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