पाठ 9
मैया मैं नहिं माखन खायो 🧈
✍️ विधा: पद (भक्ति काव्य)
✒️ कवि: सूरदास
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पाठ परिचय
यह एक अत्यंत मधुर भक्ति-पद है, जिसमें सूरदास जी ने बाल कृष्ण और माता यशोदा के बीच के प्रेम और नोंक-झोंक का बड़ा ही सजीव और मनमोहक चित्रण किया है। बाल कृष्ण माखन (मक्खन) चुराकर खाने के आरोप से बड़ी चतुराई से अपना बचाव करते हैं।
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कवि परिचय
सूरदास
अनुमानित काल: 1478 — 1583 सूरदास हिंदी साहित्य की भक्ति-काल की कृष्ण-भक्ति शाखा के सबसे महान कवि माने जाते हैं। वे जन्मांध (जन्म से नेत्रहीन) थे, फिर भी उनके पदों में कृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन इतना सजीव है मानो उन्होंने स्वयं अपनी आँखों से देखा हो। उनकी रचनाओं का संकलन "सूरसागर" के नाम से प्रसिद्ध है।📝
पद का सार (आसान भाषा में)
- बाल कृष्ण माता यशोदा से कहते हैं — "मैया, मैंने माखन नहीं खाया!" वे सफ़ाई देते हैं कि सुबह होते ही वे तो गायों के पीछे-पीछे जंगल भेज दिए गए थे।
- वे तर्क देते हैं कि पूरे दिन जंगल में बंसी (बाँसुरी बजाने की जगह) के आसपास ही भटकते रहे और शाम को ही घर लौटे — तो माखन खाने का मौक़ा उन्हें कब मिला?
- वे बड़ी मासूमियत से पूछते हैं कि वे तो अभी छोटे बालक हैं, इतनी ऊँचाई पर टँगे छींके (माखन रखने की जगह) तक उनका हाथ कैसे पहुँच सकता है?
- कृष्ण शिकायत करते हैं कि असल में उनके साथी ग्वाल-बाल ही उनके पीछे पड़े रहते हैं और ज़बरदस्ती उनके मुँह पर माखन मल देते हैं, फिर भी माँ उन्हीं शरारती दोस्तों की बात मान लेती हैं।
- वे माँ यशोदा को यह भी उलाहना देते हैं कि वे बहुत भोली हैं जो हर किसी की बात पर विश्वास कर लेती हैं, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
- इस पूरे पद में बाल कृष्ण की मासूमियत, चतुराई और यशोदा मैया के अपार वात्सल्य (माँ के प्रेम) का अत्यंत मनोहारी चित्रण हुआ है।
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मुख्य भाव
यह पद भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में से एक — माखनचोरी — पर आधारित है। इसमें बाल-सुलभ मासूमियत, चतुराई भरे तर्क और माँ-बेटे के बीच के अटूट प्रेम को बड़ी कुशलता से दर्शाया गया है। सूरदास जी की यह विशेषता है कि वे भगवान को भी एक साधारण, नटखट बालक के रूप में इतनी आत्मीयता से चित्रित करते हैं कि पाठक स्वयं को यशोदा मैया जैसा महसूस करने लगता है।
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कठिन शब्दों के अर्थ
मैया — माँ
गैयन — गायों
मधुबन — वन का नाम (जहाँ गायें चरती थीं)
पठायो — भेजा गया
चार पहर — पूरा दिन (आठ पहर में से आधा)
बंसीवट — बरगद का वह पेड़ जहाँ कृष्ण बाँसुरी बजाते थे
छींको — माखन-दही रखने के लिए लटकाई जाने वाली टोकरी
ग्वाल-बाल — कृष्ण के साथी चरवाहे बालक
बरबस — ज़बरदस्ती
पतियायो — विश्वास किया
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याद रखने योग्य बातें (एक नज़र में)
कवि: सूरदास
विधा: पद (भक्ति काव्य, ब्रजभाषा)
विषय: बाल कृष्ण की माखनचोरी और यशोदा से नोंक-झोंक
रस: वात्सल्य रस (माँ-बच्चे का प्रेम)
भाषा: ब्रजभाषा
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सीख
यह पद माँ-बच्चे के निश्छल, मधुर प्रेम और बालसुलभ मासूमियत का सुंदर चित्रण करते हुए हमें भक्ति और वात्सल्य के भाव से जोड़ता है।
✏️ ये नोट्स केवल पढ़ाई और रिवीज़न में सहायता हेतु तैयार किए गए हैं। सम्पूर्ण पाठ के लिए अपनी पाठ्यपुस्तक ज़रूर पढ़ें। | @edugrown