कथा-सारः
राधिका इन दिनों उछल-कूद करते हुए (कूर्दमाना) चलती है, क्योंकि उसके घर नए मेहमान आए हैं — एक बिल्ली (मार्जारी) और उसके चार बच्चे (शावकाः), कुल पाँच। राधिका दिन-रात केवल इन्हीं के बारे में सोचती रहती है। उसने इन चारों शावकों के नाम भी सोचे — तन्वी (सुन्दर व कोमल), मृद्वी (स्पर्श में अत्यंत कोमल), शबलः (चितकबरे रंग का), और भीमः (थोड़ा मोटा)।
राधिका बिल्ली को दूध पिलाती है, बिल्ली प्रसन्नतापूर्वक राधिका को देखती है। जब राधिका बच्चों के पास जाती है तो बिल्ली धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे आती है, परन्तु बच्चे राधिका को देखकर डरते नहीं। दादी (पितामही) राधिका की यह गतिविधियाँ देखकर हँसती हैं।
दादी राधिका से कहती हैं — "अतिथि कब आएँगे, यह हम नहीं जानते, परन्तु जब भी वे आएँ तो उनकी उचित सेवा करनी चाहिए।" राधिका दादी के गले में माला जैसे हाथ डालते हुए पूछती है — "ठीक है, करूँगी, पर क्यों?" दादी उत्तर देती हैं — 'अतिथिदेवो भव' — अर्थात् अतिथि को हमारा देवता समझकर उसकी आदरपूर्वक सेवा करनी चाहिए। राधिका पूरे दिन इस मंत्र को बार-बार दोहराती है और अंत में अपने चारों "अतिथियों" (बिल्ली के बच्चों) से वात्सल्यपूर्वक पूछती है — "क्या तुम जानते हो 'अतिथिदेवो भव' का अर्थ? तुम भी कहो — 'अतिथिदेवो भव'।"