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Quick revision notes

Chapter-8 पद (Pad) Quick Revision Notes | Class 9th Hindi (Ganga) Summary

Class 9 · Hindi (Ganga) · All Board · ENGLISH · 15 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD
काव्य खंड • अध्याय 8

पद ✒️

— रैदास (संत रविदास)

🖊️ कवि परिचय

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ था। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। रैदास संत कवियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने बाह्य आडंबरों (दिखावटी पूजा-पाठ) का खंडन किया और मन की शुद्धता तथा आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना। उन्होंने सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा में रचनाएँ कीं, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण मिलता है। उनकी भक्ति-रचनाएँ 'आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी' में भी शामिल हैं और आज भी समानता, प्रेम व भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ 'रैदास बानी' में संकलित हैं।

📖 पहला पद — अनन्य भक्ति और समर्पण

पहले पद में रैदास बताते हैं कि जैसे चंदन और पानी, दीपक और बाती, मोती और धागा, तथा बादल और मोर का रिश्ता कभी अलग नहीं होता, वैसे ही भक्त अपने आराध्य (प्रभु) से अलग नहीं हो सकता। इसमें वे स्वयं को प्रभु के साथ पूरी तरह एकाकार बताते हैं —

"प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।"

इन पंक्तियों में भक्त और आराध्य के बीच के अटूट, गहरे संबंध को अलग-अलग सुंदर उपमाओं से दर्शाया गया है — भक्त प्रभु की छाया की तरह, उनकी सुगंध की तरह, उनके प्रकाश की तरह उनसे जुड़ा हुआ है।

📖 दूसरा पद — दृढ़ निष्ठा और अडिग भक्ति

दूसरे पद में रैदास अपनी अटूट श्रद्धा व्यक्त करते हैं — वे कहते हैं कि यदि प्रभु उन्हें त्याग भी दें, तो भी वे प्रभु का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। उनके अनुसार तीर्थ-यात्रा और व्रत-उपवास ज़रूरी नहीं, बल्कि प्रभु के चरण-कमल में सच्चा भरोसा ही सबसे बड़ा साधन है —

"जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।"

वे यह भी कहते हैं कि प्रभु सर्वव्यापी हैं — जहाँ भी जाएँ, वहीं उनकी पूजा है, क्योंकि प्रभु के समान कोई दूसरा देव नहीं है। यह पद रैदास के निर्गुण भक्ति के भाव, निष्ठा और विश्वास को बड़ी सरलता और गहराई से व्यक्त करता है।

🎨 काव्य-सौंदर्य

  • उपमा अलंकार — "प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा" में।
  • रूपक अलंकार — "तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां" में चरणों को सीधे कमल कहा गया है।
  • अनुप्रास अलंकार — "प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा" में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति।
  • भाषा सरल, लोकधर्मी और गेय (गाने योग्य) है, जिससे इसमें एक विशेष लयात्मकता आती है।

कुल मिलाकर दोनों पद हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि हृदय की निष्ठा और समर्पण में है — भक्त और भगवान का रिश्ता उतना ही स्वाभाविक और अटूट है जितना चंदन में सुगंध का, या दीपक में लौ का।

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