WHATSAPP Welcome to Edugrown – Your Learning Partner
← Back to Study Content
NCERT Solution

Chapter 6 : मेरी माँ (Meri Maa) (NCERT Solution) class 6th hindi

Class 6 · Hindi (Malhar) · Chapter 6 : मेरी माँ (Meri Maa) · All Board · All Medium · 12 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD All Medium ENGLISH HINDI

हिंदी · मल्हार · अध्याय 6

मेरी माँ

आत्मकथा-अंश — रामप्रसाद 'बिस्मिल' · संपूर्ण पाठ्य-प्रश्नों के हल एक ही स्थान पर

✍️ लेखक: रामप्रसाद 'बिस्मिल' (1897–1927) 📖 विधा: आत्मकथा-अंश 🎯 सभी गतिविधियों के हल सहित
माँ और बच्चे का चित्रण
📖 मूल पाठ

मेरी माँ

रामप्रसाद 'बिस्मिल'

"श्री रामप्रसाद 'बिस्मिल' बड़े होनहार नौजवान थे। ग़ज़ब के शायर थे। देखने में भी बहुत सुंदर थे। योग्य बहुत थे। जानने वाले कहते हैं कि यदि किसी और जगह या किसी और देश या किसी और समय पैदा हुए होते तो सेनाध्यक्ष बनते।" — यह कहना है हमारे देश के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह का, बिस्मिल के बारे में।

रामप्रसाद 'बिस्मिल' का जन्म जब हुआ, उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य था। 'बिस्मिल' छोटी-सी आयु से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेज़ों से लड़ते रहे। अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल भेज दिया और फ़ाँसी की सज़ा दे दी। जेल में भी उन्होंने अंग्रेज़ों के अनेक अत्याचार सहे। जेल में रहते-रहते ही उन्होंने चोरी-छिपे अपनी आत्मकथा लिखी और अंग्रेज़ों से बचते-बचाते जेल से बाहर भेजते रहे। उनके साथियों ने उसे प्रकाशित भी करवा दिया। इसका नाम रखा गया — 'निज जीवन की एक छटा।' इस पुस्तक ने अंग्रेज़ों के होश उड़ा दिए। लोगों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध क्रोध और बढ़ गया। इस तरह इस आत्मकथा के कारण अंग्रेज़ बिस्मिल को फ़ाँसी देने के बाद भी उन्हें हरा न सके।

इस आत्मकथा के माध्यम से आज भी 'बिस्मिल' हमारे मस्तिष्क में जीवित हैं। आज भी यह आत्मकथा लोगों को प्रेरित करती है। क्या आप भी उनकी आत्मकथा को पढ़ना चाहते हैं? क्या कहा? हाँ? तो यहाँ प्रस्तुत है उसी आत्मकथा का एक अंश।

लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी। दादीजी और पिताजी तो विरोध करते रहे, किंतु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया। उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे, किंतु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं, जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड सहन करना पड़ता था। वास्तव में, मेरी माताजी देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किंतु माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा। माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।

एक समय मेरे पिताजी दीवानी मुकदमे में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर कर दूँ। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म विरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत समझाया कि मुकदमा खारिज हो जाएगा। किंतु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।

ग्यारह वर्ष की उम्र में माताजी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया।

माताजी को गृहकार्य सिखाती दादीजी की बहन — मूल पाठ्यपुस्तक का चित्र
🖼️ मूल पाठ्यपुस्तक का चित्र — माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दी जा रही है

उन्होंने माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। मेरे जन्म होने के पाँच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिंदी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था। मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थीं, उन्हीं में जो शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं। मेरी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं। जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता। उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए हैं। यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यही था कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी थी।

बिस्मिल अपनी माँ के साथ — मूल पाठ्यपुस्तक का चित्र
🖼️ मूल पाठ्यपुस्तक का चित्र — रामप्रसाद 'बिस्मिल' अपनी माँ के साथ

जन्मदात्री जननी! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने का प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि मैं अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने जिस प्रकार अपनी देववाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक झुक जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर बात को समझा दिया। यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो, किंतु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री! तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया बल्कि आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मांतर परमात्मा ऐसी ही माता दें।

महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु की दुखभरी खबर सुनाई जाएगी। माँ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता या भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बलि-देवी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा। गुरु गोबिंद सिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर सुनी तो बहुत प्रसन्न हुई थीं और गुरु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बाँटी थी। जन्मदात्री! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूँ।

— रामप्रसाद 'बिस्मिल'

रामप्रसाद 'बिस्मिल'

लेखक से परिचय — रामप्रसाद 'बिस्मिल'

(1897 – 1927)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारी वीरों ने अपना बलिदान दिया। 'सरफ़रोशी की तमन्ना' जैसा तराना लिखने वाले रामप्रसाद 'बिस्मिल' भी उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र तीस वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार द्वारा उन्हें फ़ाँसी पर लटका दिया गया।

असाधारण प्रतिभा के धनी रामप्रसाद 'बिस्मिल' एक अच्छे कवि और लेखक भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें उनकी आत्मकथा काफ़ी चर्चित रही। 'मेरी माँ' उनकी आत्मकथा का ही एक अंश है।

1️⃣ पाठ से — In-text Questions6 गतिविधियाँ

🌤️ मेरी समझ से

(क) 1. 'किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती।' — बिस्मिल को अपनी किस इच्छा के पूर्ण न होने की आशंका थी?
भारत माता के साथ रहने की अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की ⭐ अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की भोग विलास तथा ऐश्वर्य भोगने की
सही उत्तर: अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की। पाठ में लिखा है — "केवल एक इच्छा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती।" बिस्मिल को आशंका थी कि फाँसी के कारण वे अपनी माँ की सेवा जीवनभर नहीं कर पाएँगे।
2. रामप्रसाद बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?
देश की सेवा करें ⭐ कभी किसी के प्राण न लेना कभी किसी से छल न करना सदा सच बोलना
सही उत्तर: कभी किसी के प्राण न लेना। पाठ में लिखा है — "माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यही था कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना।"
(ख) अपने मित्रों के साथ तर्कपूर्ण चर्चा कीजिए कि आपने ये ही उत्तर क्यों चुने?
कक्षा में चर्चा करते समय बताया जा सकता है कि दोनों उत्तर पाठ की मूल पंक्तियों पर सीधे आधारित हैं। पहले प्रश्न का उत्तर उसी वाक्य के ठीक पहले की पंक्ति में मिलता है, और दूसरे प्रश्न का उत्तर लेखक ने स्वयं स्पष्ट शब्दों में "सबसे बड़ा आदेश" कहकर बताया है। इसलिए ये उत्तर पाठ में दिए प्रमाण के आधार पर सबसे सटीक हैं। (यह एक मौखिक चर्चा गतिविधि है — विद्यार्थी अपने शब्दों में तर्क दे सकते हैं।)

💬 पंक्तियों पर चर्चा

(क) "यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।"
इस पंक्ति में बिस्मिल कह रहे हैं कि उनकी माँ के मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और साहस के बिना वे भी आम/साधारण लोगों की तरह रोज़मर्रा के सांसारिक कार्यों (नौकरी, गृहस्थी आदि) में उलझकर एक सामान्य जीवन बिता रहे होते। उनकी माँ के त्याग व प्रेरणा के कारण ही वे एक असाधारण, देशभक्त और क्रांतिकारी व्यक्ति बन सके।
(ख) "उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।"
बिस्मिल की माँ का आदेश था कि वे कभी किसी की जान न लें, यहाँ तक कि अपने शत्रु को भी प्राणदंड न दें। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान कुछ ऐसी विवश करने वाली परिस्थितियाँ आईं, जिनमें बिस्मिल को मजबूरन एक-दो बार अपनी इस प्रतिज्ञा (कभी हिंसा न करने की) को तोड़ना पड़ा — इस बात का उन्हें स्वयं भी मलाल (अफ़सोस) था।

🔗 मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुने गए शब्दों को उनके सही अर्थ/संदर्भ से मिलाइए —
शब्दसही अर्थ / संदर्भ
1. देवनागरीभारत की एक भाषा-लिपि जिसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं।
2. आर्यसमाजमहर्षि दयानंद द्वारा स्थापित एक संस्था।
3. मेजिनीइटली के गुप्त राष्ट्रवादी दल का सेनापति; इटली का मसीहा था जिसने लोगों को एक सूत्र में बाँधा।
4. गोबिंद सिंहसिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।
मिलान हल: 1 → देवनागरी (भाषा-लिपि)  |  2 → आर्यसमाज (दयानंद जी की संस्था)  |  3 → मेजिनी (इटली का क्रांतिकारी सेनापति)  |  4 → गोबिंद सिंह (सिखों के दसवें गुरु)। ऊपर तालिका में मिलान पहले से ही सही क्रम में दिखाया गया है।

🤔 सोच-विचार के लिए

1. बिस्मिल की माताजी जब ब्याह कर आईं तो उनकी आयु काफ़ी कम थी (ग्यारह वर्ष)।
(क) फिर भी उन्होंने स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल कैसे ढाला?
शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुलाकर माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दिलवाई। थोड़े ही दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को अच्छी तरह समझ लिया और भोजन आदि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं — इस तरह उन्होंने स्वयं को परिवार के अनुकूल ढाल लिया।
(ख) उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को कैसे शिक्षित किया?
पढ़ने का शौक माताजी को स्वयं ही पैदा हुआ था। घर का सारा काम निपटाने के बाद जो थोड़ा-बहुत समय बचता, उसमें वे मुहल्ले की शिक्षित सखी-सहेलियों से अक्षर-बोध (अक्षरों का ज्ञान) करतीं और पढ़ना-लिखना सीखतीं। अपने परिश्रम के बल पर थोड़े ही दिनों में वे देवनागरी लिपि की पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं — यह सब बिना किसी औपचारिक स्कूली शिक्षा के, केवल अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर हुआ।
2. बिस्मिल को साहसी बनाने में उनकी माताजी ने कैसे सहयोग दिया?
माताजी बिस्मिल का उत्साह कभी भंग नहीं होने देती थीं, भले ही इसके लिए उन्हें स्वयं पिताजी की डाँट-फटकार व दंड सहना पड़ता था। उनके निरंतर प्रोत्साहन और अच्छे व्यवहार ने बिस्मिल के जीवन में ऐसी दृढ़ता उत्पन्न कर दी कि किसी भी संकट या विपत्ति के आने पर उन्होंने कभी अपना संकल्प नहीं त्यागा। क्रांतिकारी जीवन में भी माताजी ने वैसे ही उनकी सहायता की, जैसे इतालवी क्रांतिकारी मेजिनी की माता ने मेजिनी की सहायता की थी।
3. आज से कई दशक पहले बिस्मिल की माँ शिक्षा के महत्व को समझती थीं, बताइए कैसे?
यद्यपि माताजी स्वयं विवाह के समय अशिक्षित थीं, फिर भी उन्होंने कड़ी मेहनत से स्वयं पढ़ना-लिखना सीखा। इतना ही नहीं, दादीजी-पिताजी के बार-बार अनुरोध के बावजूद उन्होंने यह कहकर बिस्मिल का विवाह टलवा दिया कि "शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा" — इससे स्पष्ट पता चलता है कि वे शिक्षा को विवाह से भी अधिक महत्वपूर्ण मानती थीं। साथ ही, उन्होंने अपनी बेटियों (बिस्मिल की बहनों) को भी छोटी आयु में स्वयं शिक्षा दी।
4. हम कैसे कह सकते हैं कि बिस्मिल की माँ स्वतंत्र और उदार विचारों वाली थीं?
बिस्मिल की माँ बेटे के विवाह जैसे बड़े पारिवारिक निर्णय में भी स्वयं दृढ़ता से अपनी बात रखती थीं (शिक्षा पूरी होने तक विवाह न करने की ज़िद)। उन्होंने बिस्मिल को आर्यसमाज में प्रवेश करने से कभी नहीं रोका, बल्कि इसके बाद उनके अपने विचार भी और उदार हो गए। उन्होंने अपने बेटे को स्वतंत्रता आंदोलन जैसी जोखिम भरी क्रांतिकारी गतिविधियों में भी खुलकर सहयोग दिया (जैसे लखनऊ कांग्रेस जाने के लिए खर्च देना), जबकि उस दौर में अधिकतर परिवार परंपरावादी व रूढ़िवादी सोच रखते थे। यह सब उनके स्वतंत्र व उदार विचारों का प्रमाण है।

🖋️ आत्मकथा की रचना

यह पाठ रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का एक अंश है। इस पाठ की ऐसी पंक्तियों की सूची बनाइए जिनसे पता लगे कि लेखक अपने बारे में कह रहा है।
नमूना सूची (लेखक स्वयं के बारे में बता रहा है):
  • "लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी।"
  • "मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था।"
  • "वास्तव में, मेरी माताजी देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया..."
  • "एक समय मेरे पिताजी दीवानी मुकदमे में..."
  • "मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म विरुद्ध होगा..."
  • "अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था..."
  • "मेरे जन्म होने के पाँच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिंदी पढ़ना आरंभ किया।"
  • "जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता।"
  • "यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति..."
  • "जन्मदात्री जननी! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने का प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला।"
पहचान का संकेत: ये सभी पंक्तियाँ प्रथम पुरुष (मैं, मुझे, मेरा, मुझमें) में लिखी गई हैं — यही आत्मकथा शैली की मुख्य पहचान है।

🔤 शब्द-प्रयोग तरह-तरह के

"माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं" व "पढ़ना-लिखना करतीं" जैसे शब्दों को मिलाकर बनाए गए संक्षिप्त शब्दों को इस पाठ से खोजकर सूची बनाइए।
पाठ में मिलने वाले ऐसे युग्म-शब्द (जोड़े हुए शब्द):
शब्द-युग्मअर्थ
अक्षर-बोधअक्षरों का ज्ञान
पढ़ना-लिखनापढ़ना और लिखना दोनों
काम-काजघर के सभी छोटे-बड़े कार्य
चोरी-छिपेगुप्त रूप से, छिपकर
डाँट-फटकारकठोर शब्दों में डाँटना
भोग-विलासऐशो-आराम व सुख-सुविधाएँ
दो-एकएक-दो बार, थोड़ी बार
जन्म-जन्मांतरहर जन्म में, अनेक जन्मों तक
ठीक-ठीकसही ढंग से, व्यवस्थित रूप से
संसार-चक्रसांसारिक कार्यों का चक्र/जाल
2️⃣ पाठ से आगे — Exercise Questions4 गतिविधियाँ

🗣️ आपकी बात

(क) रामप्रसाद 'बिस्मिल' के मित्रों के नाम खोजिए और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी पर कक्षा में चर्चा कीजिए।
जानकारी: रामप्रसाद 'बिस्मिल' के प्रमुख साथी क्रांतिकारियों में अशफ़ाक़ुल्ला ख़ाँ (बिस्मिल के घनिष्ठ मित्र, दोनों ने मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की), चंद्रशेखर आज़ाद, ठाकुर रोशन सिंह, और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी शामिल थे। ये सभी क्रांतिकारी 1925 के प्रसिद्ध काकोरी काण्ड (काकोरी ट्रेन डकैती) में शामिल थे, जिसमें अंग्रेज़ सरकार के खजाने को लूटकर हथियार खरीदने की योजना बनाई गई थी। इस घटना के बाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्ला ख़ाँ, रोशन सिंह और लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा दी गई। (विद्यार्थी पुस्तकालय/इंटरनेट से इन क्रांतिकारियों के बारे में और खोजबीन करके कक्षा में विस्तार से चर्चा कर सकते हैं।)
(ख) दिए गए बिंदुओं के आधार पर अपनी माँ/अभिभावक से बातचीत कीजिए और उनके प्रिय रंग, भोज्य पदार्थ, गीत, बचपन की यादें, प्रिय स्थान आदि जानिए।
यह एक व्यक्तिगत साक्षात्कार गतिविधि है। विद्यार्थी अपने अभिभावक से निम्न जैसे प्रश्न पूछकर उत्तर लिख सकते हैं:
  • आपका जन्म कहाँ हुआ था?
  • आपकी प्रिय पुस्तक का नाम क्या है?
  • आपका प्रिय रंग कौन-सा है?
  • आपको बचपन में कौन-सा खेल खेलना पसंद था?
  • आपकी प्रिय भोजन-सामग्री क्या है?
  • आपको कौन-सा गीत सबसे अच्छा लगता है?
इन उत्तरों को लिखकर विद्यार्थी अपने अभिभावक के बारे में एक छोटा-सा परिचय तैयार कर सकते हैं।

📚 पुस्तकालय या इंटरनेट से

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा तथा अन्य देशभक्तों से संबंधित पुस्तकें (पत्र, आत्मकथा, जीवनी आदि) पुस्तकालय या इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और मित्रों से साझा कीजिए।
📖 यह एक स्वाध्याय (स्वयं पढ़ने की) गतिविधि है, इसमें कोई निश्चित 'उत्तर' नहीं है। बिस्मिल की पूरी आत्मकथा का नाम 'निज जीवन की एक छटा' है, जिसे पुस्तकालय या इंटरनेट पर खोजा जा सकता है।

🌍 शब्दों की बात

आप अपनी माँ को क्या कहकर संबोधित करते हैं? अन्य भाषाओं में माँ के लिए प्रयुक्त संबोधन व शब्द ढूँढ़िए। क्या उनमें कुछ समानता दिखती है?
भाषामाँ के लिए शब्द
हिंदीमाँ / माता / अम्मा
संस्कृतमातृ / माता
अंग्रेज़ी (English)Mother / Mom / Mummy
मराठीआई
तमिलअम्मा
तेलुगुअम्मा
बांग्लामा
पंजाबीमाँ / बेबे
उर्दूअम्मी
फ़्रेंच (French)Maman
स्पेनिश (Spanish)Mamá
समानता: ध्यान से देखने पर पता चलता है कि दुनिया की अधिकतर भाषाओं में माँ के लिए शब्द "म" ध्वनि (जैसे Ma, Amma, Mom, Maman, Mamá) से ही शुरू या मिलते-जुलते हैं। इसका एक रोचक कारण यह माना जाता है कि "म" ध्वनि बच्चे के लिए बोलने में सबसे आसान होती है (यह होंठ बंद करके निकलने वाली पहली स्वाभाविक ध्वनियों में से एक है), इसलिए दुनिया भर की भाषाओं में माँ के लिए मिलते-जुलते शब्द प्रचलित हो गए।

🧩 आज की पहेली

दी गई वर्ग-पहेली में पाठ से बारह विशेषण दिए गए हैं। उन्हें छाँटकर पाठ में रेखांकित कीजिए।
मंयी
प्रत्येनोछोटी
धाग्याखू
र्मिसाधाड़ा
दुरी
हास्वाधी
पहेली में छिपे 12 विशेषण (गोल्ड रंग में हाइलाइट):
मंगलमयी छोटी ग्यारह खूब धार्मिक साधारण दुखभरी महान स्वाधीन होनहार सुंदर योग्य
इन सभी शब्दों को पाठ में खोजकर रेखांकित (underline) किया जा सकता है — जैसे "तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति", "ग्यारह वर्ष की उम्र", "अति साधारण मनुष्यों की भाँति", "दुखभरी खबर", "महान से महान संकट", "स्वाधीन भारत का इतिहास", "बड़े होनहार नौजवान", "देखने में भी बहुत सुंदर" आदि।
3️⃣ झरोखे से — Extra Reading2 भाग

🇮🇳 झरोखे से — ऐ मातृभूमि!

रामप्रसाद 'बिस्मिल' द्वारा लिखी यह देशभक्ति कविता पढ़िए —

ऐ मातृभूमि!

ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो।
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो।
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में;
संसार के हृदय में, तेरी प्रभा उदय हो।

तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो।
तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो।
वह भक्ति दे कि 'बिस्मिल' सुख में तुझे न भूले,
वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।

— रामप्रसाद 'बिस्मिल'

संक्षिप्त भावार्थ: इस कविता में बिस्मिल भारत माता से प्रार्थना करते हैं कि उनकी सदैव जय और विजय हो, और उनके सभी भक्त सुख-शांति से परिपूर्ण रहें। वे कहते हैं कि अंधकार व दुख से भरी हर दिशा में भी मातृभूमि की उज्ज्वल आभा फैले। अंत में वे यह वरदान माँगते हैं कि सुख में भी वे मातृभूमि को कभी न भूलें और दुख में भी उनका हृदय कभी कायर न बने — यह कविता भी उतनी ही गहरी देशभक्ति की भावना से भरी है जितनी 'मेरी माँ' पाठ में देखने को मिलती है।

🔎 खोजबीन के लिए

माँ से संबंधित पाँच रचनाएँ पुस्तकालय से खोजें और अपनी पत्रिका बनाएँ।
📖 यह एक स्वाध्याय गतिविधि है। विद्यार्थी पुस्तकालय या इंटरनेट से माँ पर लिखी कविताएँ, कहानियाँ या लेख खोजकर एक छोटी पत्रिका (scrapbook) तैयार कर सकते हैं — जैसे सुमित्रानंदन पंत, मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों की माँ पर लिखी रचनाएँ खोजी जा सकती हैं।
🌸 सभी उत्तर NCERT 'मल्हार' पाठ्यपुस्तक, अध्याय 6 — 'मेरी माँ' पर आधारित हैं। @EduGrown

💬 Comments & Doubts

💭

Abhi tak koi comment nahi

Sabse pehle comment karne wale bano!

Apna comment likhein

Doubt ho ya suggestion — kuch bhi poochh sakte hain. Login zaroori nahi hai.

15 − 6 =

Ye sirf ye confirm karne ke liye hai ki aap robot nahi hain.

Comment publish hone se pehle admin check karta hai.

🔔 Email Updates Lein

Naya content aate hi email par pata chal jayega. Sirf wahi sections chunein jo chahiye.

🔒 Content copy nahi kar sakte