सच्चाई की जीत
अंतर-विद्यालय क्रिकेट के फाइनल में रोहन अपनी टीम का कप्तान था। आखिरी ओवर में जीत के लिए केवल चार रन चाहिए थे। तभी रोहन ने देखा कि उसकी टीम का गेंदबाज नो-बॉल फेंक रहा था, पर अंपायर का ध्यान नहीं गया और विरोधी बल्लेबाज आउट करार दे दिया गया।
टीम के सब साथी खुश थे — “चुप रहो, हम जीत जाएँगे!” पर रोहन का मन नहीं माना। उसने अंपायर के पास जाकर सच बता दिया कि वह गेंद नो-बॉल थी। उसके साथियों ने नाराज़गी जताई, पर रोहन ने कहा — “झूठ से मिली जीत, सच्ची हार के बराबर है।”
अंपायर ने निर्णय बदला और बल्लेबाज को जीवनदान मिला। उस ओवर में रोहन की टीम मैच हार गई, परंतु पूरे मैदान ने रोहन की ईमानदारी की प्रशंसा की। उसे ‘फेयर-प्ले अवार्ड’ मिला। उस दिन रोहन ने सीखा — “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”