कथासारः — गोपबन्धु दास का जीवन
भोजन-प्रसङ्गः : एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्। भोजनकाले हसन् गोपबन्धुः कहते हैं कि भोजन अत्यन्त दुर्लभ है और जीवन के लिए सुखप्रद है, अतः शरीर के प्रति संकोच न करते हुए भरपेट भोजन करना चाहिए। यह सुनकर सब हँस पड़ते हैं। ठीक उसी समय बाहर से एक भूखे भिक्षुक की करुण पुकार सुनाई देती है — "माता! मुझे कुछ भोजन दो, तीन दिनों से कुछ भी नहीं खाया।" यह सुनते ही दयाद्रवित गोपबन्धु अपनी आँखों में आँसू भरकर बिना कुछ सोचे अपने लिए परोसा गया भोजन हाथ में लेकर बाहर चले जाते हैं और उस भिक्षुक को भोजन कराते हैं।
परिचय व सेवाभाव : गोपबन्धुदास एक महान् समाजसेवक, सत्यवादि-वनविद्यालय के अध्यापक, तथा प्रसिद्ध पञ्चमित्रों में से एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। ओडिशा राज्य के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के निकट सुआण्डो ग्राम में उनका जन्म हुआ। अध्ययनकाल से ही वे दरिद्रों व रोगियों की सेवा करते थे। सत्यवादि-वनविद्यालय में वे छात्रों को निःशुल्क पढ़ाते थे, निरक्षरता दूर करने का सतत प्रयास करते थे, तथा स्वयं सूत कातकर वस्त्र-निर्माण को बढ़ावा देते थे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया, जिसके कारण उन्हें दो वर्ष का कारावास भी हुआ।
कारावास व साहित्य-सृजन : कारागार में रहते हुए उन्होंने 'बन्दीर आत्मकथा', 'कारा-कविता', 'धर्मपद', 'गो-माहात्म्य', 'नचिकेता-उपाख्यान' जैसी अनेक प्रेरणादायी पुस्तकें ओड़िआ भाषा में लिखीं। वे सदैव स्वदेशी वस्त्रों व वस्तुओं का ही उपयोग करते थे। मरणासन्न अपने पुत्र को भी छोड़कर वे बाढ़-पीड़ितों की सहायता हेतु हज़ारों लोगों को बचाने घर से बाहर निकल पड़े और समाज-सेवा में जुट गए।
सम्मान व विरासत : वे सत्यवादि-वनविद्यालय, दरिद्रनारायण-सेवा-सङ्घ, सत्यवादि-मुद्रणालय, तथा 'समाज' नामक दैनिक समाचारपत्र के संस्थापक थे। यह पत्रिका आज भी सौ से अधिक वर्षों से प्रकाशित होती है। समाज-सेवा व देश-सेवा में उनके असीम त्याग को देखकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें 'उत्कलमणि' (उड़ीसा की मणि) की उपाधि से सम्मानित किया।