हिंदी · मल्हार · अध्याय 1
मातृभूमि
कविता — सोहनलाल द्विवेदी · संपूर्ण पाठ्य-प्रश्नों के हल एक ही स्थान पर
मातृभूमि
सोहनलाल द्विवेदीऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।
गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली,
पग पग छहर रही हैं।
वह पुण्य-भूमि मेरी,
वह स्वर्ण-भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।
झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।
अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन-मन सँवारती है।
वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।
जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।
गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।
वह युद्ध-भूमि मेरी,
वह बुद्ध-भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।
— सोहनलाल द्विवेदी
कवि से परिचय — सोहनलाल द्विवेदी
सोहनलाल द्विवेदी हिंदी के प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। उनका जन्म आज से लगभग सवा सौ साल पहले हुआ था, उस समय अंग्रेज़ों का भारत पर शासन था। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से अंग्रेज़ों का विरोध किया।
उनकी लेखनी का सबसे प्रिय विषय 'देशभक्ति' था। भारत के गौरव का गान करना उन्हें बहुत प्रिय था। उनकी अन्य चर्चित रचनाएँ हैं — 'बढ़े चलो, बढ़े चलो' तथा 'कोशिश करने वालों की हार नहीं होती'।
🌤️ मेरी समझ से
🔗 मिलकर करें मिलान
| शब्द | सही अर्थ / संदर्भ |
|---|---|
| 1. हिमालय | भारत की उत्तरी सीमा पर फैली पर्वत-माला। |
| 2. त्रिवेणी | तीन नदियों की मिली हुई धारा, संगम। |
| 3. मलय पवन | दक्षिणी भारत के मलय पर्वत से चलने वाली सुगंधित वायु। |
| 4. सिंधु | समुद्र, एक नदी का नाम। |
| 5. गंगा-यमुना | भारत की प्रसिद्ध नदियाँ। |
| 6. रघुपति | श्री रामचंद्र का एक नाम, दशरथ के पुत्र। |
| 7. श्रीकृष्ण | वसुदेव के पुत्र वासुदेव। |
| 8. सीता | जनक की पुत्री जानकी। |
| 9. गीता | प्रसिद्ध व प्राचीन ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' — महाभारत में श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच हुए प्रश्न-उत्तर व संवाद। |
| 10. गौतम बुद्ध | एक प्रसिद्ध महापुरुष, बौद्ध धर्म के प्रवर्तक। |
💬 पंक्तियों पर चर्चा
वह मातृभूमि मेरी, वह जन्मभूमि मेरी।"
— इन पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
🤔 सोच-विचार के लिए
🖋️ कविता की रचना
- कविता का एक स्पष्ट शीर्षक है — "मातृभूमि"।
- हर अंतरे (stanza) के बाद "वह ... भूमि मेरी" जैसी टेक (refrain/पुनरावृत्ति) आती है, जो कविता को गीत जैसा प्रवाह देती है।
- पंक्तियों में तुकांत शब्दों (जैसे हिमालय-सिंधु में लय, झूमता-झूमता) का प्रयोग हुआ है।
- कविता चार-चार पंक्तियों के अंतरों (छंदों) में बँटी है, जिससे उसे गाना आसान हो जाता है।
📎 मिलान
| स्तंभ 1 | स्तंभ 2 (भाव) |
|---|---|
| 1. वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी। | मैंने उस भूमि पर जन्म लिया है, वह भूमि मेरी माँ समान है। |
| 2. चिड़ियाँ चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में। | वहाँ की जलवायु इतनी सुखदायी है कि पक्षी पेड़-पौधों के बीच प्रसन्नता से गीत गा रहे हैं। |
| 3. अमराइयाँ घनी हैं, कोयल पुकारती है। | यहाँ आम के घने उद्यान हैं जिनमें कोयल आदि पक्षी चहचहा रहे हैं। |
💭 अनुमान या कल्पना से
🔤 शब्दों के रूप
| शब्द-युग्म | अर्थ |
|---|---|
| घर-घर | हर घर में, प्रत्येक घर में |
| बाल-बाल | एक-एक बाल (रोम-रोम); बहुत बारीकी से / मुश्किल से बचना |
| साँस-साँस | हर साँस के साथ, प्रत्येक श्वास में |
| देश-देश | हर देश में, अनेक देशों में |
| पर्वत-पर्वत | हर पर्वत पर, एक-एक पहाड़ पर |
| नया शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तपोभूमि | तपस्या करने की भूमि/स्थान |
| देवभूमि | देवताओं का निवास-स्थान (जैसे हिमालय क्षेत्र) |
| भारतभूमि | भारत देश की धरती |
| जन्मभूमि | जिस भूमि पर जन्म लिया हो |
| कर्मभूमि | जहाँ व्यक्ति अपना कार्य/कर्तव्य करता है |
| कर्तव्यभूमि | अपने कर्तव्य निभाने की भूमि |
| मरुभूमि | रेगिस्तानी, बंजर भूमि |
| मलयभूमि | मलय पर्वत की भूमि (चंदन-वन क्षेत्र) |
| मल्लभूमि | पहलवानों/कुश्ती का अखाड़ा-स्थल |
| यज्ञभूमि | जहाँ यज्ञ किया जाता है |
| रंगभूमि | नाटक/कला के प्रदर्शन का मंच |
| रणभूमि | युद्ध का मैदान |
| सिद्धभूमि | सिद्ध (महान/पूर्ण-ज्ञानी) पुरुषों की भूमि |
🪄 थोड़ा भिन्न, थोड़ा समान
| शब्द 1 | शब्द 2 | अंतर |
|---|---|---|
| दया (करुणा) | दिया (दीपक / दिया हुआ) | 'अ' की जगह 'इ' मात्रा |
| घड़ा (मिट्टी का बर्तन) | घड़ी (समय बताने वाला यंत्र) | 'आ' की जगह 'ई' मात्रा |
| दिन (day) | दीन (गरीब, दीन-हीन) | 'इ' की जगह 'ई' मात्रा |
| मिल (मिलना) | मील (दूरी की इकाई) | 'इ' की जगह 'ई' मात्रा |
| किला (दुर्ग) | कीला (खूँटा/नुकीली कील) | 'इ' की जगह 'ई' मात्रा |
| तन (शरीर) | तान (संगीत की तान/स्वर-लहरी) | 'अ' की जगह 'आ' मात्रा |
🗣️ आपकी बात
🎼 वंशी-से
🧩 आज की पहेली
| क्रम | अक्षर | बना हुआ शब्द |
|---|---|---|
| 1 | स म ह ग र | महासागर (उदाहरण) |
| 2 | ह म य ल | हिमालय |
| 3 | ग ग | गंगा |
| 4 | भ त र | भरत |
| 5 | ल क य | कोयल |
| 6 | व न प | पवन |
🇮🇳 झरोखे से — वंदे मातरम्
| वंदे मातरम् | भावार्थ |
|---|---|
| वंदे मातरम्, वंदे मातरम्! | हे माता, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ! |
| सुजलाम्, सुफलाम्, | तुम जल से भरी हुई हो, फलों से परिपूर्ण हो, |
| मलयज शीतलाम्, | तुम्हें मलय से आती हुई पवन शीतलता प्रदान करती है, |
| शस्यश्यामलाम्, मातरम्! | तुम अन्न के खेतों से परिपूर्ण वंदनीय माता हो! |
| वंदे मातरम्! | हे माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ! |
| शुभ्रज्योत्सना पुलकित यामिनीम्, | जिसकी रमणीय रात्रि को चंद्रमा का प्रकाश शोभायमान करता है, |
| फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्, | जो खिले हुए फूलों के पेड़ों से सुसज्जित है, |
| सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्, | सदैव हँसने वाली, मधुर भाषा बोलने वाली, |
| सुखदाम् वरदाम्, मातरम्! | सुख देने वाली, वरदान देने वाली माँ, |
| वंदे मातरम्, वंदे मातरम्॥ | मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ! |
🔍 साझी समझ
🟢 समानताएँ
- दोनों रचनाओं में भारत माता की प्रशंसा व उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई है।
- दोनों में भारत की प्राकृतिक सुंदरता — नदियाँ, जल, शीतल पवन, हरियाली — का सुंदर वर्णन है।
- दोनों रचनाओं में भारत को माँ के समान मानकर सम्मान दिया गया है ('मातृभूमि' व 'मातरम्' दोनों शब्दों का अर्थ 'माता' से जुड़ा है)।
- दोनों देशभक्ति की भावना जगाने वाली रचनाएँ हैं।
🟠 अंतर
- 'वंदे मातरम्' में भारत को सीधे 'माँ' कहकर संबोधित करते हुए प्रणाम (वंदना) किया गया है, जबकि 'मातृभूमि' में भारत की विशेषताएँ वर्णन-शैली में बताई गई हैं।
- 'मातृभूमि' में हिमालय, गंगा-यमुना के साथ-साथ राम, सीता, कृष्ण, गौतम बुद्ध जैसे ऐतिहासिक/धार्मिक महापुरुषों का भी उल्लेख है, जो 'वंदे मातरम्' में नहीं है।
- 'वंदे मातरम्' मूल रूप से संस्कृतनिष्ठ भाषा में है, जबकि 'मातृभूमि' सरल हिंदी में लिखी गई है।
🔎 खोजबीन के लिए
🌺 पढ़ने के लिए — पुष्प की अभिलाषा
पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ में देना तुम फेंक।
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक।
— माखनलाल चतुर्वेदी