बिरजू महाराज से साक्षात्कारसाक्षात्कार
पाठ का परिचय
कथक की जब भी बात होती है तो हमारे मस्तिष्क में एक नाम अवश्य आता है — बिरजू महाराज। कथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी।
भारत ही नहीं, विदेशों में भी उन्हें उनकी मनमोहक प्रस्तुतियों के लिए याद किया जाता है। उनका जीवन शास्त्रीय संगीत के रागों के समान ही उतार-चढ़ाव भरा था और अपनी सफलताओं के लिए उन्होंने कठिन साधना की थी।
इस पाठ में श्रेया, तनुश्री और माणिक जैसे विद्यार्थी पद्मविभूषण श्री बिरजू महाराज से बातचीत करते हैं।
बचपन और संघर्ष
बिरजू महाराज बताते हैं कि एक ज़माना था जब उनके परिवार को ‘छोटे नवाब’ कहा जाता था। हवेली के दरवाज़े पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा होता था।
पर बाबूजी के देहांत के बाद आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं। जिन डिब्बों में कभी तीन-चार लाख की कीमत के हार हुआ करते थे, वे अब खाली पड़े थे।
संघर्ष के इस दौर में उनकी सबसे बड़ी सहयोगी उनकी माँ थीं। वे कभी कर्ज़ लेतीं तो कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचकर गुज़ारा करतीं। नृत्य के कार्यक्रमों से भी कभी-कभी ही पैसा आता था। दिन में खाना खाते तो कई बार रात को नहीं भी खाते थे।
फिर भी अम्मा बार-बार यही कहती थीं कि खाने को चाहे कुछ भी न मिले, अभ्यास ज़रूर करना है।
गुरु, गंडा और तालीम
उनके गुरु थे उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज।
घर में कथक का माहौल था, इसलिए औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही वे देख-देखकर कथक सीख गए थे और नवाब के दरबार में नाच भी चुके थे।
कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्य को गंडा (ताबीज़) बाँधते हैं और शिष्य गुरु को भेंट देता है। जब उनकी तालीम शुरू होने की बात आई तो बाबूजी ने कहा कि भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधेंगे। तब अम्मा ने दो कार्यक्रमों की कमाई भेंट के रूप में दे दी।
‘गंडा’ गुरु और शिष्य के बीच का पवित्र रिश्ता है। बिरजू महाराज ने बाद में इस रस्म को उलट दिया — वे कई वर्षों तक नृत्य सिखाने के बाद जब देखते हैं कि शिष्य में सच्ची लगन है, तभी गंडा बाँधते हैं।
पढ़ाई के साथ कला
क्या पढ़ाई या दूसरे कामों के साथ-साथ संगीत और नृत्य जारी रखना संभव है? बिरजू महाराज कहते हैं कि यह अपने सामर्थ्य पर निर्भर करता है।
उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि उनकी शिष्या शोभना नारायण आई.ए.एस. अफ़सर होने के साथ-साथ अच्छी नर्तकी भी हैं। वे स्वयं भी नृत्य के साथ-साथ बजाते और गाते भी हैं, नाटिकाएँ करते हैं और उनके लिए संगीत भी तैयार करते हैं।
जब उन्होंने नौकरी शुरू की थी तो चाचा ने चेताया था कि नौकरी में बँट जाने से भीतर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा। पर उन्होंने दृढ़ निश्चय किया था कि यदि ‘महाराज’ बनना है तो मेहनत भी करनी होगी।
कथक की शुरुआत और घराने
कथक की परंपरा बहुत पुरानी है — ‘महाभारत’ के आदिपर्व और ‘रामायण’ में इसकी चर्चा मिलती है।
पहले कथक रोचक और अनौपचारिक रूप से कथा कहने का ढंग था और तब यह मंदिरों तक ही सीमित था।
लखनऊ घराने के लोग मूलत: बनारस-इलाहाबाद के बीच हरिया गाँव के रहने वाले थे, जहाँ 989 कथिकों के घर हुआ करते थे। गाँव में एक बैरगिया नाला है जिससे एक कहानी जुड़ी है — एक बार नौ कथिक नाले के पास से गुज़र रहे थे कि तीन डाकू वहाँ आ पहुँचे। कुछ कथिक डर गए, किंतु उनकी कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उनके कथक में मगन हो गए।
लखनऊ घराने के बाद जयपुर घराने और फिर बनारस घराने का विकास हुआ। इनके अलावा रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी अलग शैली थी।
संगीत, नृत्य और ‘लय’
बिरजू महाराज कहते हैं कि गाना, बजाना और नाचना — ये तीनों संगीत का हिस्सा हैं। संगीत में लय होती है और उसका ज्ञान आवश्यक है।
नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है। नृत्य करना एक तरह से अदृश्य शक्ति को निमंत्रण देना है।
वे बड़ी सुंदर बात कहते हैं — सिर्फ़ नृत्य ही नहीं, हमारी हर गतिविधि में लय होती है। घास छीलने वाला घास को हाथ से पकड़कर हँसिया मारता है और फिर घास हटाता है। मारने और हटाने की इस लय में ज़रा-सी भी गड़बड़ी हुई तो हाथ कट सकता है।
इस तरह लय हर काम में, नृत्य में और जीवन में संतुलन बनाए रखती है। यह एक तरह का आवरण है जो नृत्य को सुंदरता प्रदान करता है। अगर नर्तक को सुर-ताल की समझ न हो तो नृत्य उसके अंगों में प्रवेश ही नहीं करेगा।
परंपरा में नयापन
उन्होंने कथक की पुरानी परंपरा को कायम रखा, पर उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए।
उन्होंने गौर किया कि उनके चाचा लोग और बाबूजी नाचते तो खूबसूरत थे ही, उनके खड़े होने का अंदाज़ भी निराला होता था। उन्होंने उन भाव-भंगिमाओं को भी कथक में शामिल कर लिया।
साक्षात्कार से क्या सीखें?
- कठिन से कठिन समय में भी अभ्यास नहीं छोड़ना चाहिए।
- गुरु-शिष्य परंपरा केवल रस्म नहीं, एक पवित्र रिश्ता है।
- प्रतिभा के साथ लगन और मेहनत भी ज़रूरी है।
- परंपरा को बचाते हुए भी उसमें नयापन जोड़ा जा सकता है।
- लय केवल संगीत की नहीं, पूरे जीवन की ज़रूरत है।
पढ़ने के लिए — नृत्यांगना सुधा चंद्रन
सुधा चंद्रन एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम नर्तकी हैं। एक दुर्घटना में उन्हें अपना एक पैर गँवाना पड़ा था।
यह ऐसी चोट थी जो किसी भी नर्तक का सपना तोड़ सकती थी, पर उन्होंने हार नहीं मानी। कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने फिर से अभ्यास शुरू किया और मंच पर लौटकर दिखाया।
उनकी कहानी बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और लगातार अभ्यास के आगे कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती।
शब्दार्थ
| साक्षात्कार | इंटरव्यू, आमने-सामने बातचीत |
| विरासत | पूर्वजों से मिली संपत्ति या कला |
| मनमोहक | मन को मोह लेने वाली |
| साधना | कठिन और लगातार अभ्यास |
| गंडा | तालीम शुरू करते समय बाँधा जाने वाला ताबीज़ |
| तालीम | शिक्षा, प्रशिक्षण |
| घराना | किसी शैली की अपनी परंपरा |
| लय | गति का संतुलन, ताल |
| भाव-भंगिमा | चेहरे और शरीर के हाव-भाव |
| पनपना | फलना-फूलना, विकसित होना |
| कथिक | कथक करने वाले कलाकार |
| अनौपचारिक | बिना किसी नियम-कायदे के |
| सामर्थ्य | क्षमता, ताकत |