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Quick revision notes

पाठ 6: गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ (Giridhar Kaviraay Ki Kundaliyaan) Quick revision notes Class 7th Hindi (मल्हार) — गिरिधर कविराय

Class 7 · Hindi (Malhar) · Chapter 6 : गिरिधर कविराय की कुंडलिया (Giridhar Kaviray Ki Kundaliya) · All Board · All Medium · 1 views

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6
कक्षा 7 · हिंदी · मल्हार

गिरिधर कविराय की कुंडलियाकविता

रचनाकार — गिरिधर कविराय · दो कुंडलियाँ, दो जीवन-सूत्र
गिरिधर कविराय की कुंडलिया

कुंडलिया क्या होती है?

कुंडलिया एक छंद है जिसमें छह पंक्तियाँ होती हैं — पहले दोहा और फिर रोला

इसकी सबसे मज़ेदार बात यह है कि जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है, उसी शब्द पर वह खत्म भी होती है — जैसे कोई कुंडली बनकर अपने आप में लौट आती हो।

गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ इतनी प्रसिद्ध हुईं कि लोग उन्हें कहावत की तरह बोलते हैं।

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पहली कुंडलिया — बिना विचारे किया काम

पहली कुंडलिया की सीख यह है कि जो बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है।

ऐसे व्यक्ति का अपना काम तो बिगड़ता ही है, साथ ही दुनिया में उसकी हँसी भी होती है।

और जब चारों ओर हँसी हो रही हो, तब मन को चैन नहीं मिलता। उस हालत में खाना-पीना, मान-सम्मान और राग-रंग — कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

कवि कहते हैं कि यह दुख हटाने की कोशिश करने पर भी हटता नहीं। बिना विचारे किया गया काम मन में हमेशा खटकता रहता है।

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बीती बात भुलाकर आगे की सुध लेना
बीती बात भुलाकर आगे की सुध लेना

दूसरी कुंडलिया — बीती बात को भुला दो

दूसरी कुंडलिया कहती है कि जो बीत गया उसे भुला दो और आगे की सुध लो।

जो काम सहज रूप से बन आए, उसी में मन लगाओ। जिस बात में मन लगे और काम बन जाए, वही करो।

ऐसा करने पर दुर्जन हँसी नहीं उड़ा पाएँगे और मन में कोई मलाल या खटक भी नहीं रहेगी।

कवि कहते हैं — यही विश्वास रखो। बीती बात को बीती मानकर आगे बढ़ोगे तो आगे सुख ही सुख है।

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सोच-समझकर बढ़ा हुआ कदम कभी नहीं डगमगाता
सोच-समझकर बढ़ा हुआ कदम कभी नहीं डगमगाता

दोनों कुंडलियों को एक साथ देखें

  • पहली कुंडलिया कहती है — काम करने से पहले सोचो।
  • दूसरी कुंडलिया कहती है — गलती हो जाए तो उसमें अटके मत रहो।
  • यानी एक सावधानी सिखाती है और दूसरी आगे बढ़ने का हौसला
  • दोनों की भाषा सरल है और बात सीधे दिल तक पहुँचती है — इसीलिए ये कहावत बन गईं।

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बिना विचारे किया काम मन में खटकता रहता है
बिना विचारे किया काम मन में खटकता रहता है
कविता का संदेश

पहले सोचो, फिर करो। और अगर कुछ बिगड़ जाए तो बीती बात को बीती मानकर आगे बढ़ो — पछतावे में उलझे रहना किसी समस्या का हल नहीं है।

कवि से परिचय

गिरिधर कविराय का जन्म अठारहवीं सदी में हुआ था और उन्हें उनकी लोकप्रचलित कुंडलियों के लिए याद किया जाता है।

उनकी रचनाओं में बहुत से ऐसे नीतिपरक पद मिलते हैं जिन्हें लोग अक्सर कहावत के रूप में बोलते हैं। उनकी कविताएँ जन-मानस में इतनी प्रसिद्ध हैं कि लोग उनका कहावतों की तरह उपयोग करते हैं।

उन्होंने अपनी कविताओं में लाठी जैसी साधारण वस्तु के उपयोग भी बताए और यह भी कि धन अधिक हो जाए तो क्या करना चाहिए।

वे लोकनीति और घर-गृहस्थी के साधारण लोक-व्यवहार की बातें सीधे और सरल शब्दों में कहने के लिए जाने जाते हैं।

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शब्दार्थ

बिचारेविचार किए बिना
पाछेबाद में
पछितायपछताना
हँसायहँसी होना
चैनसुख, शांति
मनहिं न भावैमन को अच्छा नहीं लगता
टरत न टारेहटाने पर भी नहीं हटता
खटकतचुभता है
जियमन, हृदय
बीतीबीती हुई बात
बिसारि देभुला दे
सुधि लेइध्यान दे, खबर ले
सहजआसानी से, स्वाभाविक रूप से
चित देइमन लगा
दुर्जनबुरा व्यक्ति, शत्रु
खताभूल, मलाल
परतीतिविश्वास

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— पाठ 6 के नोट्स समाप्त —

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