रहीम के दोहे 📿
पाठ परिचय
कवि परिचय
रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना)
जन्म: 1556 — मृत्यु: 1627 रहीम मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। वे एक कुशल सेनापति, कवि और विद्वान थे। उन्होंने बहुत ही सरल और प्रभावी भाषा में दोहों के माध्यम से जीवन के गहरे सत्य और नैतिक मूल्यों को व्यक्त किया, जो आज सैकड़ों वर्षों बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं।दोहे और सरल भावार्थ
रहिमन देह बड़ेन की, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए, भले ही वे किसी छोटे काम में उपयोगी न लगें। जहाँ सुई की ज़रूरत हो, वहाँ बड़ी-से-बड़ी तलवार भी किसी काम की नहीं होती — यानी हर वस्तु और व्यक्ति का अपनी जगह अपना महत्व होता है।
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहिं सुजान॥
भावार्थ: जिस तरह पेड़ अपना फल स्वयं नहीं खाता और तालाब अपना पानी स्वयं नहीं पीता, उसी तरह समझदार और सज्जन लोग दूसरों की भलाई के लिए ही धन-संपत्ति इकट्ठा करते हैं। यह दोहा परोपकार की भावना सिखाता है।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥
भावार्थ: प्रेम के धागे को कभी झटके से मत तोड़ो। एक बार टूटने पर यह धागा फिर पहले जैसा नहीं जुड़ पाता, और अगर जुड़ भी जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है — यानी रिश्तों में आई दरार का निशान हमेशा रह जाता है, इसलिए रिश्तों को सहेज कर रखना चाहिए।
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं कि 'पानी' (आब यानी चमक, इज़्ज़त और नमी) को हमेशा बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि पानी के बिना सब कुछ सूना हो जाता है। मोती, मनुष्य और आटा — तीनों का पानी (चमक/स्वाभिमान/नमी) एक बार चला जाए तो वे फिर पहले जैसे नहीं बनते।
मुख्य भाव
कठिन शब्दों के अर्थ
याद रखने योग्य बातें (एक नज़र में)
सीख
सरल एवं संक्षिप्त शब्दों में भी गहरी जीवन-नीति समाई हो सकती है — बड़ों का सम्मान, परोपकार, प्रेम और आत्मसम्मान जीवन के सबसे बड़े मूल्य हैं।