नहीं होना बीमारकहानी
कहानी का सार
कथावाचक एक बच्चा है। एक दिन वह नानीजी के साथ पड़ोसी सुधाकर काका को देखने अस्पताल गया। अस्पताल जाने का यह उसका पहला अवसर था।
एक बड़े-से वार्ड में कई एक जैसे पलंग लाइन से लगे थे — सब पर एक जैसी सफ़ेद चादर और लाल कंबल, सफ़ेद दीवारें, ऊँची छत, खिड़कियों पर हरे परदे और एकदम चमकता हुआ फ़र्श।
अस्पताल का माहौल उसे बहुत अच्छा लगा। बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-भरे पेड़ झूम रहे थे। न ट्रैफ़िक का शोरगुल, न धूल, न मच्छर-मक्खी — सिर्फ़ लोगों की धीमी-धीमी बातचीत, बाकी एकदम शांति।
नानीजी काका के लिए साबूदाने की खीर बनाकर लाई थीं और नर्स से पूछकर उन्हें चम्मच से धीरे-धीरे खिलाई। काका ने बड़े स्वाद से खीर खाई।
यह सब देखकर बच्चे के मन में आया — बीमारों के भी क्या ठाठ हैं! साफ़-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और खीर खाते रहो। काश वह भी सुधाकर काका की जगह होता!
बहाना बनाने का दिन
कुछ रोज़ बाद एक दिन उसका स्कूल जाने का मन नहीं किया। उसने होमवर्क भी नहीं किया था और स्कूल जाता तो सज़ा मिलनी तय थी। उसने सोचा कि बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा।
वह रज़ाई से निकला ही नहीं। नानीजी उठाने आईं तो उसने कहा कि वह आज बीमार है — सिर में दर्द है, पेट भी दुख रहा है और बुखार भी है।
नानाजी आए, रज़ाई हटाकर माथा छुआ, पेट देखा और नब्ज़ देखने लगे। फिर बोले कि बुखार तो नहीं है। बच्चे ने कहा कि थर्मामीटर लगाकर देखिए — उसे मालूम था कि घर में थर्मामीटर है ही नहीं, इसलिए खुद को बीमार साबित करने के लिए यह चाल अच्छी थी। बहुत ढूँढ़ा गया, पर थर्मामीटर मिला ही नहीं।
फिर उसे न चाहते हुए भी कड़वी पुड़िया खानी पड़ी और काढ़े जैसी चाय पीनी पड़ी। नानाजी ने कहा — आज इसे कुछ खाने को मत देना, आराम करने दो; शाम को देखेंगे।
दिन भर की मुसीबत
वह रज़ाई में पड़ा-पड़ा घर की गतिविधियों का अंदाज़ा लगाता रहा — अब छोटे मामा नहाकर निकले, अब कुसुम मौसी नाश्ता छोड़कर कॉलेज बस पकड़ने भागीं, अब मुन्नू अपना जूता ढूँढ़ रहा है। धीरे-धीरे सब चले गए और वह घर में अकेला रह गया।
बाहर निकलकर गली की चहल-पहल देखने की तेज़ इच्छा हुई, पर मजबूरी थी — चाहे जितनी ऊब हो, लेटे ही रहना था। कुछ देर बाद पीठ दुखने लगी तो उठकर बैठ गया, लेकिन बाहर आहट होते ही फिर लेट गया।
अचानक उसे भूख सताने लगी। फल या साबूदाने की खीर मिलने की उम्मीद सुबह ही खत्म हो चुकी थी, क्योंकि घर में तय हो चुका था कि तबीयत ढीली हो तो सबसे अच्छा उपाय भूखे रहना है, इससे सारे विकार निकल जाते हैं।
भूख के कारण ठीक से नींद भी नहीं आई। आँख लगती भी तो खाने की चीज़ें ही दिखाई देतीं — गरमागरम खस्ता कचौड़ी, मावे की बर्फ़ी, बेसन की चिक्की, गोलगप्पे और सबसे ऊपर वही साबूदाने की खीर।
उसे यह सोचकर हैरानी होती कि साबूदाने की खीर सिर्फ़ उपवास और बीमारी में ही क्यों बनाई जाती है — जैसे गुझिया सिर्फ़ होली-दीवाली और पंजीरी सिर्फ़ पूर्णिमा के दिन बनती है। ये चीज़ें जब इच्छा हो तब क्यों नहीं बनाई जा सकतीं?
कहानी का अंत
शाम को दाल-चावल की खुशबू आई — अरहर की दाल में हींग-जीरे का बघार, ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया और देसी घी। फिर एक और खुशबू आई — तली हुई हरी मिर्च की।
जब रहा नहीं गया तो वह रज़ाई फेंककर खड़ा हो गया, दबे पाँव दरवाज़े तक गया और चुपके से झाँककर देखा। सचमुच दाल-चावल और तली हुई हरी मिर्च थी। और मुन्नू आम चूस रहा था — पूरी गुठली मुँह में ठूँसे हुए, जैसे आम कभी देखे ही न हों।
जलन, गुस्से और कुढ़न में वह पाँव पटकता हुआ वापस बिस्तर में आ गया। उस पूरे दिन उसे भूखे पेट ही रहना पड़ा — सारे विकार निकल गए!
इसके बाद उसने स्कूल से छुट्टी मारने के लिए बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।
कहानी की खास बातें
- कहानी ‘मैं’ शैली में लिखी गई है, इसलिए बच्चे के मन की हर बात सीधे हम तक पहुँचती है।
- पूरी कहानी में हास्य है — बच्चा जो चाहता है, उसे उसका उल्टा मिलता है।
- अस्पताल का सुंदर वर्णन और घर की भूख — दोनों दृश्य आमने-सामने रखे गए हैं।
- कहानी उपदेश नहीं देती; नतीजा खुद ही सबक सिखा देता है।
- खाने की चीज़ों के वर्णन से बच्चे की भूख पाठक को भी महसूस होती है।
झूठ और बहाने से मुश्किल टलती नहीं, बढ़ जाती है। बहाना बनाने वाला आख़िर में खुद ही सबसे ज़्यादा परेशान होता है।
लेखक से परिचय
स्वयं प्रकाश (1947–2019) हिंदी के जाने-माने लेखक थे। उनकी कहानियाँ बच्चों और बड़ों — दोनों के दिलों को छू जाती हैं।
उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए लगता है मानो वे हमारे ही जीवन की कहानियाँ हों और हमारे ही अनुभव उन्होंने लिख दिए हों। ऐसा लगता है जैसे कोई पुराना मित्र बातें कर रहा हो।
उन्होंने बच्चों के लिए कई मनोरंजक कहानियाँ लिखीं, जिनमें साहसिक कारनामे, मित्रता और जीवन के छोटे-छोटे पर महत्वपूर्ण पहलू बड़ी रोचकता से प्रस्तुत हुए हैं। उनकी कहानियाँ मनोरंजन के साथ सोचने-समझने की नई दिशाएँ भी देती हैं।
प्रमुख रचनाएँ — मात्रा और भार, अगली किताब, ज्योति रथ के सारथी और फीनिक्स।
शब्दार्थ
| ठाठ | शान, आराम |
| नब्ज़ | नाड़ी |
| पुड़िया | कागज़ में लिपटी दवा की खुराक |
| काढ़ा | जड़ी-बूटियों का कड़वा पेय |
| विकार | रोग, गड़बड़ी |
| कुढ़न | मन ही मन जलना |
| गुड़ुप होना | गहरी नींद में चले जाना |
| चहल-पहल | रौनक, आवाजाही |
| झपकी | हल्की नींद |
| बघार | तड़का |
| आहट | हल्की आवाज़ |
| अभिवादन | नमस्कार करना |