WHATSAPP Welcome to Edugrown – Your Learning Partner
← Back to Study Content
Quick revision notes

पाठ 2: गोल (Gol) Quick Revision Notes Class 6th Hindi (मल्हार)

Class 6 · Hindi (Malhar) · Chapter 2 : गोल (Gol) · All Board · All Medium · 4 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD All Medium ENGLISH HINDI
पाठ 2

गोल 🏑

✍️ विधा: आत्मकथात्मक संस्मरण (खेल) ✒️ लेखक: ध्यानचंद
हॉकी मैच
📖

पाठ परिचय

यह पाठ भारत के महान हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद के आत्मकथात्मक संस्मरण का एक रोचक अंश है। इसमें वे अपने खेल जीवन की एक दिलचस्प घटना सुनाते हैं और बताते हैं कि गुस्से व बदले की भावना पर कैसे खेल-भावना से काबू पाया जा सकता है।
🧑‍🎨

लेखक परिचय

ध्यानचंद

ध्यानचंद

जन्म: 1905 — मृत्यु: 1979 "हॉकी के जादूगर" के नाम से विश्वप्रसिद्ध भारतीय हॉकी खिलाड़ी। इनका जन्म प्रयाग में हुआ था। 16 वर्ष की आयु में ये सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुए, जहाँ इन्होंने हॉकी खेलना सीखा। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में इन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया, जहाँ भारत ने स्वर्ण पदक जीता।
📝

पाठ का सार (आसान भाषा में)

  • लेखक बताते हैं कि खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक होती ही रहती है, और उनके समय में भी ऐसा होता था।
  • सन् 1933 में पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेलते समय, एक मुकाबले में विरोधी टीम के एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक उनके सिर पर दे मारी, जिससे उन्हें मैदान से बाहर ले जाया गया।
  • चोट पर पट्टी बँधवाकर वे फिर मैदान में लौटे और उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा कि वे इसका बदला ज़रूर लेंगे — यह सुनकर वह खिलाड़ी घबरा गया।
  • बदला लेने के लिए लेखक ने मारपीट का रास्ता नहीं चुना, बल्कि झटपट एक के बाद एक छह गोल दागकर अपनी असली ताकत दिखा दी। खेल खत्म होने पर उन्होंने उसी खिलाड़ी की पीठ थपथपाकर मित्रता का हाथ भी बढ़ाया।
  • इसके बाद लेखक अपने जीवन के बारे में बताते हैं — उनका जन्म 1905 में प्रयाग में हुआ, और 16 साल की उम्र में वे "फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट" में सिपाही बन गए, जहाँ हॉकी में उनकी रुचि जगी।
  • धीरे-धीरे अभ्यास से उनके खेल में निखार आता गया और 1936 के बर्लिन ओलंपिक में उन्हें भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। उनके अद्भुत खेल-कौशल से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें "हॉकी का जादूगर" कहना शुरू कर दिया।
  • वे विनम्रता से स्पष्ट करते हैं कि सारे गोल वे अकेले नहीं करते थे — उनकी कोशिश हमेशा यही रहती थी कि गेंद को गोल के करीब पहुँचाया जाए, यानी सफलता टीम भावना से ही मिलती है।
1936 बर्लिन ओलंपिक की भारतीय हॉकी टीम
1936 बर्लिन ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम
💡

मुख्य भाव और शीर्षक की सार्थकता

शीर्षक "गोल" का यहाँ दोहरा अर्थ है — एक तो हॉकी के खेल में किया गया गोल, और दूसरा जीवन में अपने लक्ष्य (गोल) को प्राप्त करना। यह पाठ हमें सिखाता है कि गुस्से या हिंसा से नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और खेल-भावना से ही असली जीत और सम्मान हासिल होता है। लेखक के अनुसार सफलता का कोई जादुई नुस्खा नहीं होता — लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।
ग्रामीण खेल
गाँव के मैदानों में खेले जाने वाले पारंपरिक खेल
विजेता बच्चे
खेल भावना से मिलने वाली सच्ची जीत की खुशी
📚

कठिन शब्दों के अर्थ

संस्मरण — यादों पर आधारित लेख
नोंक-झोंक — हल्की छेड़छाड़/बहस
प्रतिद्वंद्वी — विरोधी
बदला — प्रतिशोध
लगन — किसी काम में सच्ची रुचि
साधना — कठिन अभ्यास
नौसिखिया — शुरुआती/अनुभवहीन खिलाड़ी
निखार — सुधार, चमक
कप्तान — टीम का नेता
गुरु-मंत्र — सफलता का गुप्त उपाय

याद रखने योग्य बातें (एक नज़र में)

लेखक/खिलाड़ी: ध्यानचंद ("हॉकी का जादूगर")
जन्म: 1905, प्रयाग
सेना भर्ती: 16 वर्ष की आयु में, फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट
1936 बर्लिन ओलंपिक: भारतीय टीम के कप्तान — स्वर्ण पदक विजय
घटना: 1933 में सिर पर स्टिक लगने पर भी गुस्सा नहीं, छह गोल करके जवाब दिया
सफलता का मंत्र: लगन, साधना और खेल भावना
🌼

सीख

गुस्से और बदले की भावना पर काबू पाकर मेहनत, लगन और खेल-भावना से जवाब देना ही सच्ची और बड़ी जीत है।

💬 Comments & Doubts

💭

Abhi tak koi comment nahi

Sabse pehle comment karne wale bano!

Apna comment likhein

Doubt ho ya suggestion — kuch bhi poochh sakte hain. Login zaroori nahi hai.

15 − 9 =

Ye sirf ye confirm karne ke liye hai ki aap robot nahi hain.

Comment publish hone se pehle admin check karta hai.

🔔 Email Updates Lein

Naya content aate hi email par pata chal jayega. Sirf wahi sections chunein jo chahiye.

🔒 Content copy nahi kar sakte