मीरा के पदपद
पहला पद — ‘बसो मेरे नैनन में नंदलाल’
इस पद में मीरा श्रीकृष्ण से विनती करती हैं कि वे उनकी आँखों में आकर बस जाएँ।
फिर वे कृष्ण का रूप-वर्णन करती हैं — उनकी मूरत मन को मोह लेने वाली है, सूरत साँवली है और नयन बड़े-बड़े सुंदर हैं।
उनके होंठों पर अमृत जैसा रस बरसाने वाली मुरली सुशोभित है और छाती पर वैजयंती माला पड़ी है।
कमर पर छोटी-छोटी घंटियाँ शोभा देती हैं और पैरों के नूपुरों से मधुर ध्वनि निकलती है।
अंत में मीरा कहती हैं कि उनके प्रभु संतों को सुख देने वाले और भक्तों से प्रेम करने वाले गोपाल हैं।
दूसरा पद — ‘बरसे बदरिया सावन की’
इस पद में सावन के बादल बरस रहे हैं, जो मन को बहुत भाते हैं।
सावन आते ही मीरा का मन उमंग से भर गया और उन्हें अपने प्रभु के आने की आहट सुनाई दी।
बादल चारों दिशाओं से उमड़-घुमड़कर आए और बीच-बीच में बिजली चमकती रही।
नन्हीं-नन्हीं बूँदें बरसीं और शीतल, सुहावनी हवा बहने लगी।
मीरा कहती हैं कि उनके प्रभु गिरधर नागर हैं और उनके आगमन से चारों ओर आनंद-मंगल के गीत गूँज रहे हैं।
दोनों पदों की खास बातें
- पहला पद कृष्ण के रूप का है और दूसरा उनके आने की प्रतीक्षा का।
- मीरा ने कृष्ण को दूर का देवता नहीं, बल्कि अपना सबसे प्रिय माना है।
- दूसरे पद में प्रकृति और भक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं — सावन की बूँदें और मन की उमंग एक हो जाती हैं।
- भाषा में राजस्थानी और ब्रज का मीठा मेल है, इसीलिए ये पद गाए जाने पर और सुंदर लगते हैं।
- ‘पद’ एक ऐसी विधा है जो गाने के लिए ही रची जाती है।
कवयित्री से परिचय
मीरा के पद आज से लगभग 500 वर्ष पहले रचे गए थे। उन्हें हिंदी की महान कवयित्री, कृष्ण भक्त और संत माना जाता है।
माना जाता है कि मीरा बचपन से ही कृष्ण की भक्ति में मगन रहती थीं।
एक राजकुमारी होते हुए भी उन्होंने संतों का जीवन चुना और महलों को त्यागकर तीर्थों की यात्राएँ करने लगीं। उन्होंने मंदिरों में भजन गाना और सत्संग करना प्रारंभ कर दिया।
उनके गाए हुए भजन लोग आज भी श्रद्धा और प्रेम से गाते, पढ़ते और सुनते-सुनाते हैं।
शब्दार्थ
| नैनन | आँखों में |
| नंदलाल | नंद के पुत्र, श्रीकृष्ण |
| मोहनि मूरति | मन मोह लेने वाली मूर्ति |
| साँवरि सूरति | साँवला रूप |
| अधर | होंठ |
| सुधा रस | अमृत |
| मुरली | बाँसुरी |
| राजति | सुशोभित होती है |
| उर | छाती, हृदय |
| वैजंती माल | वैजयंती के फूलों की माला |
| क्षुद्र घंटिका | छोटी-छोटी घंटियाँ |
| कटितट | कमर |
| नूपुर | पायल |
| रसाल | मधुर, रसीला |
| बदरिया | बादल |
| मन भावन | मन को भाने वाली |
| उमग्यो | उमंग से भर गया |
| भनक | हल्की आहट |
| दामिन | बिजली |
| मेहा | वर्षा |
| सोहावन | सुहावनी |
| गिरधरनागर | श्रीकृष्ण |
पढ़ने के लिए — स्वामिभक्त सुमुख
हंसों के राजा मरालदेव अपनी टोली के साथ एक सरोवर पर उतरे, पर उनके पाँव आखेटक के जाल में फँस गए।
उन्होंने चुपचाप पाँव छुड़ाने का प्रयास किया, लेकिन जितना खींचते, जाल की रस्सी उतनी ही अधिक कसती जाती। उन्होंने शांति से इंतज़ार किया और फिर संकट का संकेत दिया।
संकेत सुनते ही पूरी हंस-टोली उड़ गई — केवल एक हंस वहीं रुक गया, और वह था मंत्री सुमुख।
राजा ने कहा कि सबके उड़ जाने के बाद अकेले फँसे पक्षी के लिए कोई आशा नहीं बचती, इसलिए वह भी चला जाए। पर सुमुख ने उत्तर दिया कि वह उन्हें इस स्थिति में छोड़ने के बजाय उनके साथ मर जाना अधिक पसंद करेगा। संकट की इस घड़ी में साथ रहना ही उसका परम कर्तव्य है।
तभी आखेटक आ पहुँचा। उसे देखकर खुशी हुई कि आज जाल में दो हंस फँसे हैं। पास आने पर उसने पूछा कि सुमुख तो मुक्त है, फिर वह उड़ क्यों नहीं जाता। सुमुख ने कहा कि ये उसके राजा होने के साथ-साथ प्रिय मित्र भी हैं — इन्हें मुक्त कर दो और हमें जाने दो। उसने यह भी कहा कि वह अकेले अपनी मुक्ति नहीं चाहता; चाहे तो राजा को छोड़कर बदले में उसे पकड़ ले।
इस प्रकार सौम्यता से किंतु दृढ़तापूर्वक बातचीत करके सुमुख आखेटक का हृदय परिवर्तन करने में सफल हो गया। उसकी स्वामिभक्ति देखकर आखेटक अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने बड़ी कोमलता से राजा के फँसे हुए पाँव को छुड़ाया और उसके ज़ख्मों को धोकर साफ़ किया, फिर दोनों को मुक्त कर दिया।
सीख: सच्ची स्वामिभक्ति और निडर विनम्रता कठोर से कठोर हृदय को भी बदल सकती है।
पढ़ने के लिए — विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
यह भारत का बहुत प्रसिद्ध झंडा गीत है, जिसे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने लिखा था।
गीत में तिरंगे को विजय का प्रतीक बताया गया है और सब मिलकर यह संकल्प लेते हैं कि हमारा झंडा सदा ऊँचा रहेगा।
स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में यह गीत लोगों में जोश भरता था और आज भी यह देशप्रेम और एकता का भाव जगाता है।