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Quick revision notes

द्वितीयः पाठः: जित्यं पिबामः सुभाषितरसम् (Jityaṃ Pibāmaḥ Subhāṣitarasam) Quick Revision Notes Class 8th Sanskrit (दीपकम्)

Class 7 · Sanskrit (दीपकम्) · Chapter 2 : नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् (Nityaṁ Pibāmaḥ Subhāṣitarasam) · All Board · All Medium · 1 views

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📖 पाठ का परिचय
Students in classroom with teacher discussing subhashitam
✏️ कक्षा में विद्यार्थी सुभाषितों पर चर्चा करते हैं
महोदय ! अस्माकं विद्यालयस्य भित्तौ 'अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः' इति लिखितम् अस्ति । अस्य कः भावः ?
🔵 हिन्दी: महोदय! हमारे विद्यालय की दीवार पर 'कोई भी मनुष्य अयोग्य नहीं है, पर उसे पहचानने वाला दुर्लभ है' — यह लिखा है। इसका क्या भाव है?
💡 एक छात्री अपने शिक्षक से दीवार पर लिखे श्लोक का अर्थ पूछती है।
वत्सः ! मानवानां विविधमूल्यानां विकासाय श्रेष्ठजनैः उक्तानि सुवचनानि एव सुभाषितानि । सुभाषितानां पठनेन अस्माकं नैतिकः सामाजिकः च विकासः भवति ।
🔵 हिन्दी: बच्चो! मनुष्यों के विभिन्न मूल्यों के विकास के लिए श्रेष्ठ लोगों के द्वारा कहे गए सुन्दर वचन ही 'सुभाषित' हैं। सुभाषितों के पढ़ने से हमारा नैतिक और सामाजिक विकास होता है।
💡 सुभाषित = श्रेष्ठ लोगों के सुन्दर वचन जो जीवन में मार्गदर्शन करते हैं।
✦ ✦ ✦
📜 श्लोक १ — पाँच वकार
वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च ।
वकारैः पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजितः ।।१।।
पाँच वकारों से युक्त मनुष्य समाज में सम्मानित होता है।
भावार्थः — यः जनः समुचितानि वस्त्राणि धरति, शरीरेण स्वस्थः अस्ति, सदा सुमधुरं हितकरं च वचनं वदति, सर्वदा अध्ययने संलग्नः भवति, तथा च विनम्रतया व्यवहरति — तादृशः पञ्चभिः वकारैः युक्तः मनुष्यः लोके सम्मानं प्राप्नोति ।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — जो मनुष्य उचित वस्त्र पहनता है, शरीर से स्वस्थ है, सदा मीठी और हितकारी बात बोलता है, हमेशा पढ़ाई में लगा रहता है, और विनम्रता से व्यवहार करता है — वह इन पाँच 'व' (वस्त्र, वपु/शरीर, वाणी, विद्या, विनय) से युक्त मनुष्य संसार में सम्मान पाता है।
💡 पाँच वकार याद रखो: वस्त्र + शरीर + वाणी + विद्या + विनय = सम्मान
📜 श्लोक २ — छः दोष
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ।।२।।
समृद्धि चाहने वाले व्यक्ति को ये छः दोष छोड़ने चाहिए।
भावार्थः — अस्मासु निद्रादयः षड् दोषाः भवन्ति । एते अस्माकं ऐश्वर्यस्य उन्नतेश्च अवरोधकाः भवन्ति । यदि मानवः जीवने धनिकः विद्वान् वा भवितुम् इच्छति तर्हि सः इमान् षड् दोषान् परित्यजेत् ।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — हम में ये छः दोष रहते हैं: (१) निद्रा (अत्यधिक नींद), (२) तन्द्रा (आलसीपन/कर्महीनता), (३) भय, (४) क्रोध, (५) आलस्य, (६) दीर्घसूत्रता (काम को आगे के लिए टालना)। ये हमारी उन्नति में बाधा डालते हैं। इन्हें छोड़ो।
💡 ये ६ दोष उन्नति के रास्ते में रोड़ा हैं — इन्हें छोड़ो!
📜 श्लोक ३ — शुद्धि के चार उपाय
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।।३।।
भावार्थः — प्रतिदिनं स्नानेन मानवस्य शरीरं स्वच्छं भवति । सत्येन मनः पवित्रं भवति (सत्य बोलने से मन में दुविधा और भय नहीं रहता) । नित्यं विद्याभ्यासेन परिश्रमेण च जीवस्य शुद्धिः भवति । ज्ञानेन च बुद्धिः निर्मला भवति ।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — जल (स्नान) से शरीर शुद्ध होता है। सत्य बोलने से मन पवित्र होता है। विद्या और परिश्रम से जीव की शुद्धि होती है। और ज्ञान से बुद्धि निर्मल होती है।
💡 ४ शुद्धियाँ: जल→शरीर | सत्य→मन | विद्या/परिश्रम→जीव | ज्ञान→बुद्धि
📜 श्लोक ४ — भारत का परिचय
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।४।।
भावार्थः — हिन्दमहासागर के उत्तर भाग में और हिमालय के दक्षिण भाग में जो भूभाग है, उस भूभाग का नाम 'भारतवर्ष' है। यहाँ के नागरिक 'भारतीय' कहलाते हैं।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — हिन्द महासागर के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है — उसका नाम भारत है। वहाँ रहने वाले लोग भारतीय हैं। यह हमारी भौगोलिक पहचान है।
💡 यह श्लोक भारत की भौगोलिक सीमा बताता है।
📜 श्लोक ५ — बूँद-बूँद से घड़ा भरे
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ।।५।।
भावार्थः — जैसे निरन्तर जल की बूँदों के गिरने से खाली घड़ा भी भर जाता है, वैसे ही जीवन में निरन्तर अभ्यास से सामान्य मनुष्य भी सभी प्रकार का ज्ञान, धर्म और धन प्राप्त कर लेता है।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — जैसे एक-एक बूँद से घड़ा भरता है, वैसे ही एक-एक दिन के प्रयास से विद्या, धर्म और धन प्राप्त होता है। निरन्तर प्रयास ही सफलता का रहस्य है।
💡 बूँद-बूँद से घड़ा भरता है → एक-एक दिन के अभ्यास से महान् बनो।
📜 श्लोक ६ — बुद्धि का विकास
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितानुपाश्रयति ।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलमिव विस्तारिता बुद्धिः ।।६।।
भावार्थः — जो निरन्तर पढ़ता है, लिखता है, देखता (अवलोकन करता) है, प्रश्न पूछता है, और विद्वान जनों के पास जाता है — उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से खिले कमल की पंखुड़ी की तरह पूर्णतः विकसित हो जाती है।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — पाँच काम करने वाले की बुद्धि कमल की तरह खिलती है: (१) पढ़ना, (२) लिखना, (३) देखना/अवलोकन, (४) विनम्रता से प्रश्न पूछना, (५) ज्ञानियों के पास जाना।
💡 सूर्य की किरणों से जैसे कमल खिलता है — वैसे ये ५ काम करने से बुद्धि खिलती है।
📜 श्लोक ७ — मीठी बोली
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।।७।।
भावार्थः — मधुर भाषण से सभी प्राणी, हमारे सभी मित्र, माता, पिता, भाई आदि प्रसन्न होते हैं। मधुर भाषण से कोई हानि नहीं। इसलिए सदा मधुर भाषण ही करना चाहिए। मधुर भाषण में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — मीठी बोली से सभी प्राणी खुश होते हैं, इसलिए हमेशा मीठा बोलो। वचन (शब्द) में कंजूसी कैसी? वचन में कोई खर्च नहीं होता।
💡 मीठी बोली = मुफ्त का वरदान। इसमें कंजूसी क्यों करें?
📜 श्लोक ८ — आलस्य = शत्रु
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।८।।
भावार्थः — आलस्य ही मनुष्य के शरीर में रहने वाला महान् शत्रु है। यही हमारे काम में बाधा डालता है। परिश्रम ही हमारा वास्तविक मित्र है। जो परिश्रम करता है वह कभी दुःख नहीं पाता।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — आलस्य मनुष्य का शरीर में बसा सबसे बड़ा दुश्मन है। और परिश्रम जैसा कोई मित्र नहीं — परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता।
💡 आलस्य = घर का दुश्मन। परिश्रम = सबसे पक्का दोस्त।
📜 श्लोक ९ — परोपकार
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।९।।
भावार्थः — महर्षि वेदव्यास के अठारह पुराणों का सार दो वचनों में है: दूसरों का उपकार करने से पुण्य होता है, और दूसरों को पीड़ा देने से पाप होता है। इसलिए हमें सदा परोपकार करना चाहिए और दूसरों को कभी कष्ट नहीं देना चाहिए।
🔵 हिन्दी: अर्थात् — अठारह पुराणों का सार सिर्फ दो बातों में है: दूसरों की मदद करो = पुण्य कमाओ। दूसरों को तकलीफ दो = पाप कमाओ। बस इतना याद रखो।
💡 व्यासजी का सार: परोपकार = पुण्य | परपीड़न = पाप। जीवन का सबसे बड़ा सत्य।
📚 @edugrown | दीपकम् | कक्षा ७

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