📌 स्रोत (Source): यह पाठ ऋग्वेद के दशम मण्डल के सूक्त १०.१९१ से लिया गया है।
📌 इसे संज्ञान-सूक्तम् या संघटन-सूक्तम् भी कहते हैं।
📌 इस पाठ में एकता, सहयोग और सामंजस्य का सन्देश दिया गया है।
📌 एक विद्यालय के पादकन्दुक-क्रीडा (Football) में विजय की कहानी से पाठ की शुरुआत होती है।
- जो दल मिलकर खेलता है, एकता रखता है — वही जीतता है!
- विपक्षी दल में परस्पर द्वेष था, इसलिए वे हारे।
- वेद का संदेश — साथ चलो, साथ बोलो, मन एक करो।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १ ॥
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
🔹 संवदध्वं = एकस्वर से बोलो (Speak in one voice)
🔹 वः मनांसि संजानताम् = आपस में मनोभाव समझो
✏️ भावार्थ (Short Notes) :
हे मानवों! अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में मिलकर आगे बढ़ो।
परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करते हुए एक स्वर से बोलो।
एक-दूसरे के मनोभाव को भलीभाँति समझो, परस्पर मनोभेद मत करो।
जैसे सृष्टि के प्रारम्भ में देव-शक्तियाँ मिलकर अपना-अपना कार्य करती हैं — वैसे ही आप भी करो।
🔹 समितिः समानी = सबकी लक्ष्यसिद्धि समान हो
🔹 समानं मनः = मन एकजुट हो
🔹 सह चित्तम् = बुद्धि भी एक हो
✏️ भावार्थ (Short Notes) :
एक साथ काम करने वालों का सोचना समान हो, लक्ष्य समान हो।
घर, कक्षा और समाज में बिना द्वेष के सब मिलकर सुखपूर्वक जीएँ।
ऋषि कहते हैं — "मैं आप सबके संकल्पों को दिव्यभाव से जोड़ता हूँ, एकता के यज्ञ में आहुति देता हूँ।"
🔹 हृदयानि समाना = हृदय एक जैसे हों (प्रेम भरे)
🔹 मनः समानम् = मन एकरूप हो
🔹 सु सह असति = मिलकर अच्छे से रहें
✏️ भावार्थ (Short Notes) :
हे मानवों! तुम्हारे संकल्प समान हों, हृदय प्रेमपूर्ण हों।
जिससे तुम्हारा संघटन सुन्दर और उत्कृष्ट हो — उसके अनुसार मन एकरूप रखो।
इसी से परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में सुख, शान्ति और मैत्री बनी रहती है।
- एकजुट होने से प्रसन्नता, सौमनस्य और उत्साह मिलता है।
- संगठन से आयु, आरोग्य, विजय और समृद्धि प्राप्त होती है।
- ऐक्यभाव से धर्म, ज्ञान और आत्मतृप्ति होती है।
- वेद का संदेश — वैमनस्य त्यागकर ऐक्यभाव से जीओ!
🌟 याद रखो: यह पाठ हमें सिखाता है कि परिवार, विद्यालय, समाज और राष्ट्र — सब में एकता से ही सफलता मिलती है। वेद की यही शिक्षा है जो हज़ारों साल पहले भी सत्य थी और आज भी है!
🔹 आज्ञार्थे (आदेश देने के लिए) — छात्राः! उत्तिष्ठत।
🔹 आमन्त्रणार्थे (निमंत्रण के लिए) — भवन्तः आगच्छन्तु।
🔹 आशीर्वादार्थे (आशीर्वाद के लिए) — आयुष्मान् भव।
🔹 सामान्यतः गम् धातु परस्मैपदी है।
🔹 परंतु जब सम् उपसर्ग लगता है तो आत्मनेपद रूप बनता है।
🔹 गम् + ति = गच्छति → सम् + गच्छति = सङ्गच्छते
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम | संगच्छताम् | संगच्छेताम् | संगच्छन्ताम् |
| मध्यम | संगच्छस्व | संगच्छेथाम् | संगच्छध्वम् ✓ |
| उत्तम | संगच्छै | संगच्छावहै | संगच्छामहै |
💡 याद रखो: संगच्छध्वम् = मध्यम पुरुष, बहुवचन (लोट् आत्मनेपद)। यही पाठ का शीर्षक-शब्द है!
📌 वेद चार हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः
📌 इस पाठ का स्रोत — ऋग्वेद
📌 ऋग्वेद में १०,५५२ मन्त्र, १० मण्डल, १०२८ सूक्त हैं।
📌 यह पाठ दशम मण्डल, सूक्त १९१ से है।
- शिक्षा, व्याकरण, छन्दः, निरुक्त, ज्योतिष, कल्पः
- न्यायः, वैशेषिकं, साङ्ख्यं, योगः, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदान्तः)
Notes by @edugrown | Class 8 Sanskrit | दीपकम्