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NCERT Solution

Chapter 8 : बिरजू महाराज से साक्षात्कार (Birju Maharaj Se Saakshatkaar) (NCERT Solution) Class 7th Hindi

Class 7 · Hindi (Malhar) · Chapter 8 : बिरजू महाराज से साक्षात्कार (Birju Maharaj Se Saakshatkaar) · All Board · All Medium · 2 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD All Medium ENGLISH HINDI
08 ✦ कक्षा 7 · मल्हार · अध्याय 8

बिरजू महाराज से साक्षात्कार

पूरे पाठ के सभी प्रश्नों के विस्तृत, सरल हल — साक्षात्कार से लेकर अभ्यास तक।

पंडित बिरजू महाराज
कथक की बात हो और बिरजू महाराज का नाम न आए — यह संभव नहीं। पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज का जीवन शास्त्रीय संगीत के रागों की तरह उतार-चढ़ाव भरा रहा। इस पाठ में कुछ बच्चे उनसे बातचीत करते हैं और हम उनकी कला, संघर्ष व सोच को जानते हैं।

पाठ से

Intext — पाठ के भीतर दी गई सभी गतिविधियाँ
मेरी समझ से

(क) सबसे सही उत्तर के सामने तारा () लगाया गया है। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी सही हो सकते हैं।

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“गंडा” — गुरु और शिष्य के बीच का पवित्र रिश्ता
(1) बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन क्यों किया होगा?
वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे।
वे नृत्य शिक्षण के लिए इस परंपरा को महत्वपूर्ण नहीं मानते थे।
वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे।
वे शिष्य की भेंट देने की सामर्थ्य को परखना चाहते थे।
क्यों? बिरजू महाराज कहते हैं — “कई वर्षों तक नृत्य सिखाने के बाद जब देखता हूँ कि शिष्य में सच्ची लगन है, तभी गंडा बाँधता हूँ।” अर्थात् उन्होंने रस्म उलटी कर दी ताकि पहले शिष्य की सच्ची लगन व समर्पण परखा जा सके।
(2) “जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है।” बिरजू महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए?
पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा।
कोई भी संस्था नृत्य प्रस्तुतियों के लिए आमंत्रित नहीं करती थी।
किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी।
नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे।
क्यों? कभी वे “छोटे नवाब” कहलाते थे, हवेली पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा और लाखों के हार थे (सुख-समृद्धि — चढ़ाव)। पिता के देहांत के बाद आर्थिक तंगी आ गई (उतार)। दोनों मिलकर “उतार-चढ़ाव” दर्शाते हैं।
(3) बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए?
संगीत, नृत्य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करती हैं।
कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
वर्तमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नहीं है।
क्यों? वे कहते हैं — “यह भी एक खेल है, जिसमें बहुत-कुछ सीखने को मिलता है। इस खेल में संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।”

(ख) आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

यह चर्चा का प्रश्न है। मित्रों के साथ बात कीजिए कि आपने प्रत्येक उत्तर किस पंक्ति के आधार पर चुना। इससे पता चलता है कि पाठ को ध्यान से पढ़ने पर हर उत्तर का प्रमाण पाठ में ही मिल जाता है, और चर्चा से समझ और पक्की होती है।

मिलकर करें मिलान

शब्दों का उनके सही संदर्भ/अवधारणा से मिलान:

शब्दसही संदर्भ या अवधारणा
कर्नाटक संगीत शैलीभारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है; जल तरंगम, वीणा, मृदंग, मंडोलिन से संगत। (संदर्भ 2)
घरानाकलाकारों का एक समुदाय/कुटुंब जो संगीत-नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करते हैं; परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण से आगे बढ़ती है। (संदर्भ 4)
शास्त्रीय संगीतप्राचीन गायन-वादन-गीत-नृत्य-अभिनय परंपरा का अभिन्न अंग; शब्दों से अधिक सुरों का महत्व, नियमों की प्रधानता। (संदर्भ 1)
हिंदुस्तानी संगीत शैलीशास्त्रीय संगीत की एक शैली, मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित; तबला, सारंगी, सितार, संतूर से संगत; प्रमुख राग छह। (संदर्भ 6)
कनछेदनहिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक; कान में सोने या चाँदी का तार पहनाने से संबंधित। (संदर्भ 3)
लोक नृत्यकिसी क्षेत्र विशेष में लोक द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक नृत्य; फसल-कटाई, उत्सवों पर किए जाते हैं। (संदर्भ 5)
संक्षेप में — कर्नाटक→2, घराना→4, शास्त्रीय संगीत→1, हिंदुस्तानी शैली→6, कनछेदन→3, लोक नृत्य→5
शीर्षक
इस पाठ का शीर्षक ‘बिरजू महाराज से साक्षात्कार’ है। यदि आप कोई अन्य नाम देना चाहें तो क्या नाम देंगे और क्यों?
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नमूना उत्तर:

  • “संघर्ष से शिखर तक” — क्योंकि बिरजू महाराज ने आर्थिक कठिनाइयों के बीच कठिन साधना करके कथक के शिखर को छुआ।
  • “लय के साधक : बिरजू महाराज” — क्योंकि उनके जीवन और कला का मूल आधार ‘लय’ है।
  • “कथक सम्राट की कहानी” — क्योंकि पाठ उनके जीवन, कला और सोच को सामने लाता है।

मैंने ऐसा नाम इसलिए सोचा क्योंकि वह पाठ के मुख्य भाव (संघर्ष, साधना और लय) को एक ही पंक्ति में व्यक्त कर देता है।

पंक्तियों पर चर्चा
1. “तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।”

चाचा का आशय था कि नौकरी करने पर बिरजू महाराज का ध्यान बँट जाएगा और उनकी नृत्य-प्रतिभा पूरी तरह विकसित नहीं हो पाएगी। किसी एक बड़े लक्ष्य को पाने के लिए पूरी एकाग्रता और समर्पण आवश्यक है।

2. “नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।”

नृत्य केवल शारीरिक क्रिया नहीं है। इसमें शरीर (मुद्राएँ), ध्यान (एकाग्रता) और तपस्या (कठोर अभ्यास/साधना) — तीनों का योग होता है। इसलिए नृत्य एक साधना है।

3. “कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।”

कथक में गर्दन की गति बहुत कोमल, नाजुक और सूक्ष्म होती है — ठीक वैसे जैसे दीपक की लौ हल्के-हल्के काँपती है। यह पंक्ति कथक की सुंदरता और भाव-भंगिमा की बारीकी को दर्शाती है।

सोच-विचार के लिए
1(क) बिरजू महाराज औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?

उनके घर में कथक का पूरा माहौल था — उनके पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराजलच्छू महाराज कथक के प्रसिद्ध कलाकार थे। इसी वातावरण में वे देख-देखकर कथक सीख गए और नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे।

1(ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?
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नाचना, गाना और बजाना — तीनों संगीत का हिस्सा हैं

गाना, बजाना और नाचना — तीनों संगीत के अंग हैं। संगीत में लय होती है और नृत्य की हर गति भी लय पर टिकी होती है। यदि नर्तक को सुर-ताल/लय की समझ नहीं होगी, तो वह पहचान ही नहीं पाएगा कि ‘लहरा’ (धुन) ठीक है या नहीं, और नृत्य के अंगों में सही प्रवेश नहीं कर पाएगा। लय ही नृत्य को सुंदरता और संतुलन देती है।

1(ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्यों में रुचि थी?
  • मशीनें/यंत्र: कोई भी मशीन खोलकर उसके कल-पुर्जे देखना; ब्रीफकेस में पेचकस-औजार रखना; पंखा-फ्रिज ठीक करना (कहते थे — नर्तक न होता तो शायद इंजीनियर होता)।
  • चित्रकारी: पेंटिंग बनाने का शौक; पिछले दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र बनाए।
  • गायन-वादन: तबला, हारमोनियम (लहरा) बजाना, फिल्मी व अन्य गाने गाना।
  • रचना: नृत्य-नाटिकाएँ और उनके लिए संगीत तैयार करना।
1(घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?
  • यदि बच्चे की रुचि है तो उसे लय के साथ खेलने दें — इसे एक खेल की तरह लें, जिसमें संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग सीखने को मिलता है (बौद्धिक विकास के लिए महत्वपूर्ण)।
  • लड़कियों के पास शिक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें; हुनर ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता।

2. पाठ से वे प्रसंग जिनसे पता चलता है कि —

(क) बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।

वे कथक नर्तक होने के साथ-साथ गाते-बजाते (तबला, हारमोनियम) थे, संगीत व नृत्य-नाटिकाएँ रचते थे, चित्रकारी करते थे (~70 चित्र), और मशीनें ठीक कर लेते थे। ये सब उनकी बहुमुखी प्रतिभा के प्रमाण हैं।

(ख) उन्हें नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में उनकी माँ का बड़ा योगदान रहा।

“संघर्षों के दौर में मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थीं।” उन्होंने कर्ज लेकर, पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर सोने-चाँदी के तार बेचकर गुजारा किया; बार-बार कहतीं — “खाने को चना मिले या कुछ भी न मिले, पर अभ्यास जरूर करो।” तालीम शुरू होने पर उन्होंने अपने दो कार्यक्रमों की कमाई भेंट के रूप में दी।

(ग) बिरजू महाराज महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर थे।

“मेरी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया, पर मैंने अपनी बेटियों को खूब सिखाया।” वे कहते हैं कि लड़कियों के पास भी हुनर होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बनें। उनकी शिष्या शोभना नारायण (आई.ए.एस. अफसर और अच्छी नर्तकी) का उल्लेख भी इसी सोच को दर्शाता है।

शब्दों की बात

(क) मूल शब्द के आगे जुड़ने वाला अंश उपसर्ग और पीछे जुड़ने वाला अंश प्रत्यय कहलाता है।

उपसर्ग (आगे)प्रत्यय (पीछे)
अदृश्य = + दृश्य
आवरण = + वरण
प्रशिक्षण = प्र + शिक्षण
सीमित = सीमा + इत
सुंदरता = सुंदर + ता
भारतीय = भारत + ईय
सामूहिक = समूह + इक

(ख) दो तबलों (उपसर्ग/प्रत्यय + मूल शब्द) की सहायता से बने नए शब्द

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एक तबले में अंश (उपसर्ग/प्रत्यय), दूसरे में मूल शब्द
मूल शब्द + अंशनया शब्द
आ + गमनआगमन
सु + नामसुनाम
सु + कर्मसुकर्म
राष्ट्र + ईयराष्ट्रीय
श्रम + इकश्रमिक
संस्कृति + इकसांस्कृतिक
साधारण + तासाधारणता
मर्म + इकमार्मिक
खंड + इतखंडित
नाम + इतनामित

(ग) पाठ में से उपसर्ग/प्रत्यय से बने कुछ और शब्द + वाक्य

  • आर्थिक — बाबूजी के देहांत के बाद परिवार को आर्थिक परेशानियाँ हुईं।
  • प्रशिक्षण — गुरु से नियमित प्रशिक्षण लेना आवश्यक है।
  • सामूहिक — लोक नृत्य एक सामूहिक कला है।
  • शास्त्रीय — कथक भारत का एक शास्त्रीय नृत्य है।
  • आत्मनिर्भर — हुनर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है।
शब्दों का प्रभाव
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“…कला में इतना दम था कि डाकू…कथक में मग्न हो गए”
1. “…उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।” — ‘इतना’ हटाकर पढ़िए; क्या परिवर्तन आया?

‘इतना’ हटाने पर वाक्य बनता है — “…कला में दम था कि डाकू…मग्न हो गए।” अब वाक्य से अतिशयता/बल का भाव कम हो जाता है। ‘इतना’ शब्द बताता है कि कला में दम इस हद तक था कि डाकू भी सब भूलकर मुग्ध हो गए — यह प्रभाव ‘इतना’ के बिना फीका पड़ जाता है।

विशेष प्रभाव देने वाले कुछ और शब्द (रेखांकित):

आठ-आठ सिपाहियों का पहरा”, “अम्मा बार-बार कहतीं”, “फिल्मी गाने खूब गाता था”, “नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा”, “कतई नहीं करता”, “अभ्यास ज़रूर करो”, “सबसे बड़ी सहयोगी”।

पाठ से आगे

Exercise — पाठ से आगे की सभी गतिविधियाँ व अभ्यास
कला का संसार
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शास्त्रीय नृत्य की एक झलक — कथकली
(क) कथक की प्रस्तुतियों में किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं?
  • चाचा-बाबूजी के खड़े होने के निराले अंदाज़ और भाव-भंगिमाओं को कथक में शामिल किया।
  • टैगोर, त्यागराज आदि आधुनिक कवियों की रचनाओं पर नई कथक रचनाएँ बनाईं।
  • पहले दृश्यों का विस्तृत वर्णन होता था; अब संकेत देकर (‘पनघट की गत देखो’) बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।
  • पहले मंच नहीं होता था — फर्श पर चाँदनी (सफेद चादर) बिछती थी और दर्शक चारों ओर बैठते थे; अब मंच पर प्रस्तुति होती है।
  • शृंगार में बदलाव (पहले चंदनलेप और पान से होंठ रंगना)।

परंपरा तो कायम रखी, पर प्रस्तुतीकरण को समय के अनुसार निखारा।

(ख) लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है?
आधारलोक नृत्यशास्त्रीय नृत्य
प्रकृतिसामूहिक (कई लोग साथ)एक नर्तक अकेला ही काफ़ी
उद्देश्यअपने मन-बहलाव व संतुष्टि, मनोरंजनदर्शकों के लिए प्रस्तुति
अवसरथकान दूर करने, उत्सव, फसल-कटाईनिश्चित शैली-नियमों पर आधारित मंच-प्रस्तुति
स्वरूपअनौपचारिकखास शैली व रूप निश्चित (साधना आवश्यक)

शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक हुआ करता था; धीरे-धीरे शैली-रूप निश्चित होने पर वह शास्त्रीय नृत्य बन गया।

(ग) बैरगिया नाला वाला पद — अपने क्षेत्र का कोई लोकगीत प्रस्तुत कीजिए।
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कथिकों की कला में मग्न डाकू — बैरगिया नाला की कथा

पाठ में हरिया गाँव के कथिकों की कला से जुड़ा यह लोकपद दिया है:

बैरगिया नाला जुलुम जोर,
नौ कथिक नचावें तीन चोर।
जब तबला बोले धीन-धीन,
तब एक-एक पर तीन-तीन।

यह गतिविधि है — आप अपने क्षेत्र/भाषा का कोई प्रचलित लोकगीत (जैसे कोई त्योहार, फसल या विवाह का गीत) कक्षा में सुनाइए और बताइए कि वह किस अवसर पर गाया जाता है।

साक्षात्कार की रचना
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हर व्यक्ति का साक्षात्कार अलग तैयारी माँगता है

‘साक्षात्कार’ भेंटवार्ता जैसा लगता है, पर इसका एक निश्चित उद्देश्य और ढाँचा होता है। यह किसी नौकरी वाले साक्षात्कार से भिन्न, व्यक्तिपरक साक्षात्कार है जो व्यक्ति के जीवन, कामकाज, रुचि-अरुचि व विचार पाठकों तक लाता है।

(क) साक्षात्कार से पहले क्या-क्या तैयारियाँ की गई होंगी?
  • बिरजू महाराज के जीवन, कला व उपलब्धियों पर पूरी जानकारी/शोध जुटाया।
  • क्रमबद्ध प्रश्नों की सूची बनाई (बचपन → गुरु → कथक का इतिहास → बदलाव → रुचियाँ)।
  • बातचीत का ढाँचा तय किया; संवेदनशीलता और धैर्य रखा।
  • समय, स्थान और रिकॉर्डिंग/लेखन की व्यवस्था की।
(ख) आप इस साक्षात्कार में और क्या-क्या प्रश्न जोड़ना चाहेंगे?
  • आपकी सबसे यादगार प्रस्तुति कौन-सी रही?
  • विदेशों में दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती थी?
  • आपका पसंदीदा ताल कौन-सा है और क्यों?
  • नए/युवा नर्तकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
(ग) यदि किसी सब्जी विक्रेता, रिक्शा चालक या घरेलू सहायक/सहायिका का साक्षात्कार लेना हो तो प्रश्न कैसे होंगे?

प्रश्न सरल, सम्मानजनक और उनके जीवन-अनुभव पर केंद्रित होंगे, जैसे:

  • आपका एक दिन कैसे बीतता है?
  • इस काम में सबसे बड़ी कठिनाई क्या है और आप उसे कैसे संभालते हैं?
  • इस काम में आपको सबसे अच्छा क्या लगता है?
  • आप अपने बच्चों के लिए क्या सपने देखते हैं?
सृजन
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कथक की घूमती हुई मुद्रा
(क) दर्शकों को कथक नृत्यकला के बारे में क्या-क्या बताएँगे?
  • कथक ब्रजभूमि की रासलीला से उत्पन्न, ‘कथिक’ (कथावाचक) शब्द से बना एक शास्त्रीय नृत्य है।
  • यह लय, ताल और भाव-भंगिमा पर आधारित है; कथिक कथाओं को नाच व अभिनय से कहते थे।
  • इसके प्रमुख घराने हैं — लखनऊ, जयपुर और बनारस।
  • तबलावादक और नर्तक की जुगलबंदी इसका मुख्य आकर्षण है।
(ख) कार्यक्रम की सूचना देने के लिए एक विज्ञापन तैयार कीजिए।
नमूना विज्ञापन —
🎶 कथक संध्या 🎶
हमारे विद्यालय में भव्य कथक नृत्य कार्यक्रम!
📅 दिनांक: __ | 🕕 समय: __ | 📍 स्थान: विद्यालय सभागार
लय, ताल और भाव-भंगिमा का अद्भुत संगम देखिए। प्रवेश निःशुल्क — सभी सादर आमंत्रित हैं!
(ग) यदि दर्शकों में कोई दृष्टिबाधित व्यक्ति हो तो विद्यालय की ओर से क्या व्यवस्था हो?
  • नृत्य का सजीव ध्वनि-वर्णन (ऑडियो कमेंट्री) हो, ताकि वे मुद्राओं व कथा को ‘सुनकर’ समझ सकें।
  • घुँघरू व तबले की ध्वनि स्पष्ट सुनाई दे; बैठने की व्यवस्था आगे की पंक्ति में हो।
  • कार्यक्रम-विवरण ब्रेल में उपलब्ध हो; एक सहायक साथ रहे।
  • प्रस्तुति से पहले नृत्य की कथा संक्षेप में समझा दी जाए।
आज की पहेली — तालों के नाम खोजिए

डायरी में छिपे संगीत के तालों के नाम शब्द-पहेली में से ढूँढ़े गए (नारंगी घेरे वाले अक्षर):

तीरूति
क्ष्मी
वा
झूराड़ा
दीचंदीदा
ड़ढ़
रा
रूपक — स्तंभ 3 (ऊपर से नीचे: रू-प-क) तिलवाड़ा — स्तंभ 6 (ति-ल-वा-ड़ा) कहरवा — पंक्ति 3 (क-ह-र-वा) झूमरा — पंक्ति 4 (झू-म-रा) दीपचंदी — पंक्ति 5 (दी-प-चं-दी) दादरा — स्तंभ 5 (दा-द-रा)
डायरी में इन तालों के नाम आए थे — तिलवाड़ा, दादरा, झूमरा (कलाकारों ने पूछा) और दीपचंदी, कहरवा (दर्शकों को पसंद), साथ ही एक कलाकार का नाम रूपक भी। ये सभी पहेली में छिपे हैं।
झरोखे से — नृत्य की छटाएँ

बिरजू महाराज ने भारत के जिन प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों का उल्लेख किया, उनका संक्षिप्त परिचय:

नृत्य शैलीराज्य/क्षेत्रमुख्य बात
भरतनाट्यमतमिलनाडुसबसे प्राचीन रूप; मंदिर नर्तकों की एकल प्रस्तुति ‘सादिर’ से संबंध।
कथकलीकेरल/दक्षिण भारतरामायण-महाभारत की कथाएँ; पुरुष मंडली द्वारा; भाव-भंगिमा व आँख-भौंह संचालन प्रमुख।
कथकउत्तर भारत (लखनऊ आदि)ब्रज की रासलीला से उत्पन्न; घरानों का विकास; तबला-नर्तक की जुगलबंदी।
कुचिपुड़ीआंध्र प्रदेशप्रार्थना से आरंभ; कर्नाटक संगीत की संगत; तरंगम प्रस्तुति से समापन।
मणिपुरीमणिपुर (उत्तर-पूर्व)शिव-पार्वती का दैवीय नृत्य; ‘लाई हरोबा’ त्योहार; हाथ के हाव-भाव व पैरों की गति।
ओडिसीओडिशा‘सोदा नृत्य’ से नाम; त्रिभंग मुद्रा (शरीर का तीन मोड़) मुख्य आकर्षण।
मोहिनीअट्टमकेरलघुमावदार कोमल आंगिक अभिनय; ‘मुंडू’ पोशाक; परंपरागत रूप से केवल स्त्रियाँ।
साझी समझ
भारत के मानचित्र में राज्यानुसार शास्त्रीय एवं लोक नृत्य दर्शाइए।

यह समूह-गतिविधि है। ऊपर दी गई “नृत्य की छटाएँ” तालिका आपके काम आएगी। मानचित्र में इस तरह अंकित कर सकते हैं:

राज्यशास्त्रीय नृत्यप्रसिद्ध लोक नृत्य
तमिलनाडुभरतनाट्यमकुम्मी, करगाट्टम
केरलकथकली, मोहिनीअट्टमतिरुवातिरा
उत्तर प्रदेशकथकराई, चरकुला
आंध्र प्रदेशकुचिपुड़ीधिम्सा
मणिपुरमणिपुरीथांग-ता
ओडिशाओडिसीघुमरा
पंजाबभांगड़ा, गिद्धा
गुजरातगरबा, डांडिया
खोजबीन के लिए

भारतीय नृत्य, संगीत और बिरजू महाराज को और जानने के लिए ये इंटरनेट कड़ियाँ देखी जा सकती हैं:

▶ भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य संगत
▶ कथक परिचय — भाग 7
▶ पंडित बिरजू महाराज
पढ़ने के लिए — नृत्यांगना सुधा चंद्रन
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नृत्यांगना सुधा चंद्रन

यह प्रेरक पूरक-पाठ बताता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से हर बाधा पार की जा सकती है:

  • सुधा चंद्रन ने पाँच वर्ष की आयु से ‘कला-सदन’ में कथक/भरतनाट्यम सीखना शुरू किया और जल्दी ही प्रतिभाशाली नर्तकी बनीं।
  • 2 मई 1981 को एक बस दुर्घटना में उनका दायाँ पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा — किसी भी नर्तकी के लिए यह जीवन का अंत जैसा था।
  • डॉ. पी.सी. सेठी ने उनके लिए विशेष ‘जयपुर फुट’ (कृत्रिम पैर) बनाया। कठोर अभ्यास से — कटे पैर से खून रिसने पर भी — उन्होंने फिर से नृत्य करना सीखा।
  • 28 जनवरी 1984 को उन्होंने दुबारा सार्वजनिक प्रदर्शन किया और सफल रहीं; तेलुगु फिल्म ‘मयूरी’ (हिंदी में ‘नाचे मयूरी’) में अपना ही जीवन जीवंत कर 33वें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में विशेष पुरस्कार पाया।

संदेश: “प्रयास करो तो सब कुछ संभव है” — साहस और अभ्यास से असंभव भी संभव हो जाता है।

— रामाज्ञा तिवारी

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