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Quick revision notes

Chapter-10 भारती, जय, विजय करो! (Bharati, Jai, Vijay Karo!) Quick Revision Notes | Class 9th Hindi (Ganga) Summary

Class 9 · Hindi (Ganga) · All Board · ENGLISH · 5 views

Ye material inke liye bhi hai: All Board BIHAR BOARD CBSE CHHATTISGARH BOARD JHARKHAND BOARD MP BOARD NIOS RAJASTHAN BOARD UP BOARD
काव्य खंड • अध्याय 10

भारति, जय, विजयकरे! ✒️

— सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

🖊️ कवि परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ था, हालांकि वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोला गाँव के निवासी थे। उनकी औपचारिक पढ़ाई सिर्फ नौवीं कक्षा तक ही हुई, पर उन्होंने स्वाध्याय (खुद पढ़कर) से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी भाषा का गहरा ज्ञान हासिल किया। निराला छायावादी कवियों में सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग करने वाले कवि माने जाते हैं। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं — अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। इसके अलावा उन्होंने उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध भी लिखे। उनकी संपूर्ण साहित्य-रचना 'निराला रचनावली' के आठ खंडों में प्रकाशित है। उनकी कविताओं में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति और प्रकृति का विराट चित्रण मिलता है, साथ ही उपेक्षितों-पीड़ितों के प्रति गहरी सहानुभूति भी झलकती है। सन् 1961 में उनका निधन हुआ।

📖 कविता का सार

'भारति, जय, विजयकरे!' एक देशप्रेम से भरी प्रेरणादायक कविता है, जिसमें कवि भारत माता का एक भव्य, दिव्य चित्र खींचता है — मानो भारत कोई साक्षात देवी हो। कविता के आरंभ में ही कवि "भारति, जय, विजयकरे!" कहकर भारत की जय-विजय की कामना करते हैं और उसे "कनक-शस्य-कमलधरे" यानी सोने जैसी सुनहरी फसलों और कमल को धारण करने वाली देवी के रूप में संबोधित करते हैं। इससे भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य का बोध होता है।

कवि आगे बताते हैं कि लंका तक फैली भारत की भौगोलिक विशालता है, जहाँ गरजती हुई समुद्र की लहरें भारत माता के पवित्र चरणों को धो रही हैं। भारत के वृक्ष, तृण (घास), वन और लताएँ मानो उसके वस्त्र हैं, जिन पर पुष्प जड़े हुए हैं। पवित्र गंगा नदी, जिसमें उज्ज्वल जल-कण चमकते हैं, मानो भारत माता के गले में पड़ा हुआ श्वेत हार है। हिमालय के शुभ्र (सफेद) हिम और तुषार से बना उसका मुकुट है। भारत के प्राण में ॐकार की ध्वनि बसी है, जो चारों दिशाओं में उदारतापूर्वक गूँज रही है — मानो सैकड़ों मुखों और सैकड़ों स्वरों की मुखरता से पूरा देश सजीव है।

"तरु-तृण-वन-लता वसन, अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण, धवल धार हार गले।"

इस प्रकार कवि ने भारत की प्रकृति का मानवीकरण करके उसे एक चेतन, जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया है — जिसकी दिशाओं में ओंकार की गूँज है और जो अनेक स्वरों-विचारों से समृद्ध है। कविता में भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की भव्य प्रशंसा की गई है।

🎨 काव्य-सौंदर्य व विशेषताएँ

  • अनुप्रास अलंकार — जैसे "शतमुख-शतरव-मुखरे" में 'श' वर्ण की बार-बार आवृत्ति।
  • रूपक अलंकार — "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" में हिमालय को सीधे भारत का मुकुट कह दिया गया है।
  • भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है (जैसे कनक-शस्य-कमलधरे — समस्त पद)।
  • कविता में भारत के प्रति गहरा राष्ट्रप्रेम, प्रकृति-चित्रण और भौगोलिक सौंदर्य का सुंदर मेल है।

यह कविता स्वतंत्रता-पूर्व लिखी गई थी और आज भी हमें भारत की प्राकृतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक समृद्धि पर गर्व करना सिखाती है, साथ ही 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को भी दर्शाती है।

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